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सिवनी: सर्वर समस्या के चलते गरीबों को नहीं मिल रहा है राशन

धारनाकला (एस.शुक्ला): बरघाट छेत्र मे सर्वर समस्या के चलते राशन दुकानो से गरीब राशन लिये बिना ही वापस बैरंग लौट रहे है लगातार पिछले माह से ही बरघाट विकाश खंड मे सर्वर की समस्या बनी हुई है जिससे राशन वितरण करने वाली पी ओ एस मशीन ही नही चल पा रही है जिससे लगातार राशन लेने राशन दुकान पहुच रहे गरीब घंटो सर्वर की समस्या से जूझ रहे है.

पिछले माह अक्टूबर मे भी बमुश्किल हुआ था राशन वितरण

बरघाट विकाश खंड मे सर्वर समस्या आज की नही अपितु पिछले माह भी यही स्थिति थी जिसमे सर्वर समस्या के चलते गरीब परेशान हुऐ थे चूकि राशन विक्रेता के अनुसार बिना पी ओ एस मशीन मे फिगर के राशन वितरण नही किया जा सकता

ऐसी स्थिति मे गरीब अपना काम धाम छोडकर राशन लेने जा रहा जिसमे बमुश्किल दिन भर मे सर्वर समस्या के चलते पचास कार्ड धारियो के भी फिंगर नही आ रहे है जिससे राशन दुकान मे शाम तक गरीब सर्वर आने के इन्तजार मे खडा रहता हो और अन्त मे वापस बैरंग लौट रहा है.

दो बार देने होते है फिंगर

यहा यह भी उल्लेखनीय है की वर्तमान मे राशन कार्ड धारी को अपना राशन लेने के लिये दो बार फिगर देना पड रहा है जबकि इसके पूर्व पी ओ एस मशीन मे एक बार फिगर देने पर कार्ड धारी को रेगुलर एव प्रधान मन्त्री जन कल्याण का राशन मिल जाता था किन्तु शासन के बदले नियमो के चलते अब राशन कार्ड धारी को दोनो राशन रेगुलर एवं फ्री का लेने के लिये दो बार फिगर देना पड रहा है सर्वर की समस्या के चलते बमुश्किल एक बार के फिंगर होने मे काफी समय लग रहा है नीति तो शासन की है परन्तु गरीब राशन विक्रेता सेल्समैन पर ही अपना गुस्सा जाहिर कर रहे है.

यहा यह बताना भी लाजिमी है की पूर्व मे गरीबो को राशन दुकानो से एक बार के फिगर मे ही रेगुलर और फ्री का राशन आसानी से मिल जाता था और एक दिन मे ही सैकड़ो कार्ड धारीयो को राशन प्राप्त हो जाता था किन्तु अब दो बार फिंगर होने से पहले की तुलना मे आधे लोगो को ही राशन मिल पाता है और समय भी दोहरा लग रहा है साथ ही राशन दुकान मे तौल करने वाले को भी दोहरा पैसा देने की स्थिति अब राशन दुकान संचालन करने वाले की बन गई है.

बुजुर्गो के नही आ रहे फिगर

यहा यह भी उल्लेखनीय है की ग्रामीण छेत्र मे अनेक बुजुर्ग ऐसे है जिनके पी ओ एस मशीन मे फिगर नही आते ऐसी स्थिति मे आफलाइन ऐसे गरीबो को राशन आसानी से मिल जाये ऐसी कोई व्यवस्था भी अब तक नही बनाई गई है जिससे आये दिन ऐसे बुजुर्ग व्यक्तियो को परेशानी से गुजरना पडता है ऐसी स्थिति को भी ध्यान मे रखते हुऐ शासन प्रशासन को कारगर कदम उठाने की आवश्यकता होनी चाहिये

बंशी ठाकुर ने लिखा पत्र

सर्वर समस्या से त्रस्त राशन विक्रेताओ के सम्बन्ध मे बंशी ठाकुर जिलाध्यक्ष मध्य प्रदेश खाद्यान्न सहकारी समिती कर्म चारी महासंघ भोपाल जिला इकाई सिवनी ने खाद्य अधिकारी को पत्र लिखकर उल्लेख किया है की खाद्यान वितरण मे लगातार दो माह से सर्वर की। समस्या बनी हुई है सर्वर न मिलने से खाद्यान वितरण गेहू चावल शक्कर नमक वितरण मे परेशानी का सामना करना पड रहा है

सर्वर समस्या माह अक्टूबर से बनी हुई है जिससे कर्मचारीयो और हितग्राहीयो के बीच मे वाद विवाद की स्थिति का सामना करना पड रहा है इस समय गांव मे हितग्राहीयो को खेती का काम भी होता है और मजदूरी का भी जिस कारण से ग्रामीण मजदूर अपनी मजदूरी छोडकर दिन दिन भर शासकीय उचित मूल्य की दुकानो पर राशन प्राप्त करने के लिये बैठे रहते है उक्त कारणो के कारण वाद विवाद बढता जा रहा है

अगर सर्वर की समस्या का निदान नही किया जाता है तो तो शासन द्वारा आफ लाइन वितरण करवाया जाये और अगर आफलाइन वितरण नही कराया जाता है तो जब तक सर्वर की समस्या रहेगी तब तक उक्त विक्रेता कर्म चारी किसी प्रकार का वितरण कार्य करने मे सक्षम नही रहेगे पत्र मे यह भी उललेख किया है की उक्त समस्याओ को देखते हुऐ समस्त कर्मचारी मानसिक रूप से प्रताडित हो रहे है अगर किसी कर्म चारी को किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय घटना घटती है तो उसकी समस्त जवाबदारी शासन एवं प्रशासन की होगी तथा खाद्य विभाग भी इसमे पूर्ण जवाबदार होगा

सिवनी: शासकीय सेवक ले रहे एक रुपये किलो एवं मुफ्त का राशन

धारनाकला (एस.शुक्ला): सरकार द्वारा गरीब परिवारो के हित के लिये बनाई जा रही अनेको योजनाए सिर्फ कागज़ो तक ही सिमट कर रह जाती है और उनमे से महत्वपूर्ण सरकार द्वारा बनाई गई राशन कार्ड योजना है जो गरीब को वास्तविक लाभ मिले इस उद्देश्य से बनाई गई है.

किन्तु राशन कार्ड का लाभ किस तरह से शासकीय सेवक एव धन्नासेठ ले रहे है यह बरघाट जनपद मे देखा जा सकता है जहा गरीब आज भी एक रूपये किलो का राशन लेने से वंचित है.

वही दूसरी तरफ पचास हजार रूपये माह की वेतन पाने वाले और करोडो की संपति धारक फर्जी राशन कार्ड के सहारे एक रूपये किलो का और मुफ्त का राशन लेकर वास्तविक गरीब का हक छीन रहे है किन्तु इस ओर विभाग के आला अधिकारियो का ध्यान नही है

शासकीय सेवक और लखपति ले रहे है लाभ

उल्लेखनीय है की धारनाकला ग्राम पंचायत मे लगभग 776 परिवार है और गरीब राशन कार्ड धारियो की बात करे तो यहा लगभग 650 गरीब राशन कार्ड धारी है जिन्हे सरकार द्वारा चलाई जा रही गरीब राशन कार्ड योजना का लाभ मिल रहा है.

किन्तु हकीकत यह है की वास्तविक गरीब आज भी शासन की इस महती योजना से कोसो दूर है और शासकीय सेवा से जुडे लोग जिन्हे पचास हजार रूपये माह की पगार मिल रही है और जिनके पास लाखो की सम्पति आलीशान मकान लाखो का व्यापार संचालित है वे लोग एक रूपये किलो और फ्री का राशन लेकर मौज करते नजर आ रहै है किन्तु गरीब अपना आज भी शासन की इस महती योजना से दूर है

दो पहिया एवं चार पहिया वाहन से लेने आते है राशन

यहा यह भी उल्लेखनीय है की मार्च 2020 से कोरोना काल मे पी एम कल्याण अन्न योजना का शुभारंभ हुआ था और 2020 मे लाक डाऊन लागू होने के गरीबो को कोरोना महामारी की वजह से देश के 80 करोड लोगो को इसका लाभ मिल रहा है किन्तु हकीकत मे आज भी ऐसे परिवार एवं लोगो के नाम गरीबी रेखा और अन्त्योदय अन्न योजना मे दर्ज है जो आज की स्थिति मे धन से सम्पन्न होते हुए शासकीय सेवक के पद पर है किन्तु उन्हे शासन की महत्वपूर्ण योजना का लाभ मिल रहा है वही दूसरी तरफ गरीब आज भी इस योजना के लाभ से वंचित है और शासकीय सेवक तथा अमीर प्रति माह दो पहिया और चार पहिया वाहन से राशन लेने राशन दुकान आ रहे है

सरपंच और सचिव ने निभाई अहम भूमिका

यहा यह भी उल्लेखनीय है ग्राम पंचायतो के सरपंच सचिव ने अपने वालो और परिवार से जुडे लोगो के नाम गरीबी रेखा मे जोडनेऔर अन्त्योदय कार्ड बनाने कोई देरी नही की फिर चाहे वह परिवार अथवा मुखिया इसमे पात्रता रखता हो या नही परन्तु वोट बैक के चक्कर मे ऐसे लोगो के कार्ड बना दिये गये जिनके पास जमीन से लेकर पक्का मकान दो पहिया और चार पहिया वाहन के साथ साथ अच्छा खासा व्यवसाय ही क्यो न हो और यही कारण है की जो सही मे वास्तविक गरीब है वो आज भी राशन कार्ड बनाने के लिये लिये दर दर की ठोकर खा रहा है.

सी एम हेल्पलाइन बनी औपचारिकता

यहा यह भी उल्लेखनीय है की मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया द्वारा जनता जनार्दन की सुविधा के लिये बनाई सी एम हेल्प लाइन सुविधा भी औपचारिकता बनकर गई है चूकी व्यक्ति तब 181 मे शिकायत दर्ज करवाता जब सम्बन्धित विभाग इस दिशा मे कोई कार्रवाई नही करता किन्तु शिकायत करने के बाद भी विभागीय अधिकारी आफिस मे बैठे शिकायत का निराकरण करते है तथा शिकायत बढते चलती है और अन्तिम मे अधिकारी के द्वारा शिकायत को आधार हीन बताकर शिकायत को विलोपित करने का निर्णय तर्क प्रस्तुत कर दिया जाता है किन्तु हकीकत मे शिकायत की जाच विधिवत रूप से मौके पर न कर निराकरण पेश कर दिया जाता है और यह एक ही विभाग ही नही अपितु समस्त विभाग मे यही क्रम चलते आ रहा है.

प्रधानमंत्री आवास मे भी यही है आलम

यही स्थिति प्रधान आवास की जहा गरीब अपना आशियाना बनाने का इन्तजार कर रहा है और जिनके पहले से ही पक्के मकान मौजूद है लाखो रूपये की जिनके पास बेशक कीमती जमीन है उन्हे सबसे पहले लाभ मिल चुका है और इस लाभ को पाने के लिये एक साथ रहते हुए भी लोग ग्राम पंचायत से बडी तेजी से परिवार विभाजन की कार्रवाई कर अपना नाम सिर्फ परिवार से इस लिये अलग कर रहे है ताकि उन्हे भी प्रधान मन्त्री आवास का लाभ मिल जाये अनेको पंचायतो मे तो यहा तक देखा गया है बाप और बेटे का प्रधान मन्त्री आवास के तहत एक साथ भवन बन रहा है

ग्रामीण जनो ने की निस्पक्ष जांच कर कार्रवाई की मांग

धारनाकला के ग्रामीण सन्तोष राहगडाले मो हममद फहीम खान दिगम्बर नागेश्वर सहित अनेक लोगो ने अपात्र एव शासकीय सेवा से जुडे लोगो की जांच करते हुऐ कार्रवाई की मांग की है ताकि शासन की महती योजनाओ का लाभ पात्रता रखने वाले लोगो और परिवार के लोगो के मिल सके क्या संवेदन शील जिला कलेक्टर इस ओर ध्यान दे कार्रवाई करेगे ऐसी जन अपेक्षा है

जनजातीय गौरव दिवस पर विशेष: मानव सभ्यता की विकास यात्रा की सहभागिता रही हैं म.प्र. की जनजातीय भाषाएँ

किसी भी मानव-समुदाय की पृथक पहचान उसकी जीवन-शैली, सांस्कृतिक परंपराओं और भाषा-बोली से होती है। आज स्थिति यह है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया में दुनिया की सैकड़ों बोलियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। किसी भी सभ्यता के विकास में भाषा की प्रमुख भूमिका होती है। मनुष्य अपने भाव अथवा विचार भाषा के माध्यम से ही अन्य व्यक्ति तक सम्प्रेषित करता है। इस प्रकार भाषा मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाने में केन्द्रीय तत्व के रूप में कार्य करती है। जनजाति समुदायों की भाषाओं पर विचार करते हुए यह तथ्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ये भाषाएँ मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा में सहयात्री रही हैं, इसलिये इनमें आरंभिक मनुष्य द्वारा अन्वेषित और अर्जित पारंपरिक ज्ञान संचित है,जो अत्यंत मूल्यवान है।

    जनजातीय भाषाओं का एक-एक शब्द संबंधित समुदाय की सांस्कृतिक निधि है। इन भाषाओं की परंपरागत वाचिक (मौखिक) संपदा के माध्यम से ही मानव-इतिहास, सभ्यता-संस्कृति, वनस्पति और जीव-जगत, कृषि, वास्तु एवं अन्य कला-कौशलों संबंधित ज्ञान की परंपरा को समझा जा सकता है। अन्य उन्नत भाषाओं और सभ्यताओं से सघन संपर्क के कारण जनजातीय भाषाओं के स्वरूप में बदलाव आ रहा है। भाषा की यह परिवर्तनशीलता एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। भारत की सांस्कृतिक विविधता में भाषिक भिन्नता एक प्रमुख घटक है। राष्ट्र की इस वैविध्यपूर्ण विशेषता को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न भाषा-बोलियों को बचाए रखना आवश्यक है। यह निश्चित है कि भाषाओं को बचाने का काम उसे बोलने वाले  ही कर सकेंगे।

      मध्यप्रदेश में 43 अनुसूचित जनजातियाँ अथवा उनके समूह हैं। पहले प्रत्येक जनजाति समुदाय की अलग भाषा हुआ करती थी। अब केवल भीली, भिलाली, बारेली, पटलिया, गोंडी, ओझियानी, अगरिया, बैगानी, कोरकू, मवासी, नहाली ही कुछ क्षेत्रों में परिवर्तित रूपों के साथ संबंधित समुदायों की प्राय: पुरानी पीढ़ी द्वारा बोली जाती हैं। अन्य जनजातियों की बोलियाँ लुप्त हो चुकी हैं, जैसे-कोल की कोलिहारी, परधान की परधानी, भारिया की भरियाटी, सहरिया की सहरानी, खैरवार या कोंदर की खैरवारी तथा भिम्मा, नगारची, मोंगिया सहित अन्य जनजातियों की भाषाएँ भी।

   भारत की मान्य भाषाएँ वे हैं, जो आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हैं।तकनीकी रूप से ये प्रायः वे भाषाएँ हैं, जिनके प्रयोक्ताओं की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से अधिक है और जिनका समृद्ध साहित्यिक इतिहास है। इनके अलावा भी देश में अनेक भाषाएँ हैं,जिनका प्रयोग व्यापक क्षेत्र में होता है और जिनमें प्रचुर मात्रा में साहित्य भी उपलब्ध है। वर्ष 1961 की जनगणना में कुल 1652 मातृभाषाएँ चिन्हित की गयीं थीं, जिनमें से 184 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 10 हजार से अधिक थी। ‘पीपुल ऑफ इंडिया’ के अनुसार भारत में 75 प्रमुख भाषाएँ हैं, जबकि मातृभाषा के रूप में 325 बोलियों का प्रयोग होता है। ‘एथनोलॉग’ में उल्लेख किया गया है कि भारत में कुल 398 भाषाएँ रही हैं, जिनमें से 387 जीवित हैं और 11 मृत हो चुकी हैं। एक आकलन के अनुसार 32 भाषाएँ ऐसी हैं, जिनका प्रयोग 10 लाख अथवा उससे अधिक लोग करते हैं। यूनेस्को की मान्यता पर ध्यान दें तो भारत में 400 भाषाएँ हैं, जिनमें से 70 से 80 प्रतिशत विलोपन के क्षेत्र में हैं।

आयुक्त भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा वर्ष 2005 में प्रस्तुत ‘लघु भाषाएँ : विशेष प्रतिवेदन’ में उल्लेखानुसार भारत में कुल 116 भाषाएँ हैं, जिनमें से 22 आठवीं अनुसूची में तथा 94 उसके बाहर हैं। इनके अलावा दस हजार से कम प्रयोक्ताओं वाली अनेक बोलियाँ हैं, जिनमें से 44 सुपरिभाषित हैं। इसी प्रतिवेदन में बताया गया है कि चार अण्डमानीय भाषाएँ- अका 50, जारवा 300, सैंटिनलीज़ 100 तथा ओंजे 100 भाषा-भाषियों के साथ जीवित हैं।

       मध्यप्रदेश जनजातीय जनंसख्या की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है।जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, यहाँ भारत सरकार द्वारा जारी अनुसूची में शामिल 43 जनजाति समूह आबाद हैं, जिनमें जनंसख्या की दृष्टि से भील, गोंड, कोल,सहरिया,बैगा, कोरकू आदि प्रमुख हैं। आदिम जाति समूह के अंतर्गत बैगा, भारिया और सहरिया शामिल हैं। इन सभी जनजातियों की अपनी-अपनी बोलियाँ हैं। भील समूह की भीली, भिलाली, बारेली, पटलिया आदि बोलियाँ प्रमुख रूप से झाबुआ, अलीराजपुर, धार, खरगौन, बड़वानी, रतलाम, मंदसौर आदि जिलों में बोली जाती है। यह आर्य भाषा परिवार से संबंधित भाषा समूह है। इन बोलियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। गोंडी मध्य भारत की प्रमुख जनजातीय भाषा है। एक कालखंड में वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा से लेकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में गोंडवाना साम्राज्य स्थापित था।उन क्षेत्रों में आज भी गोंडी के विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है। मध्यप्रदेश में प्रमुख रूप से मंडला, डिण्डौरी, जबलपुर, बालाघाट, सिवनी, शहडोल, अनूपपुर, सीधी, रायसेन, सागर, होशंगाबाद, बैतूल, छिन्दवाड़ा आदि जिलों में गोंडी बोली जाती है। यह द्रविड़ भाषा-परिवार की भाषा है। मध्यप्रदेश में इसके दो रूप देखने को मिलते हैं। एक आधुनिक रूप, जिसे ‘मंडलाही’ कहा जाता है, इसमें आर्य बोलियों-जैसे छत्तीसगढ़ी, बुंदेली आदि के साथ हिन्दी-मराठी के शब्दों की प्रचुरता है और दूसरा मूल द्रविड़ियन रूप, जो ‘पारसी’ कहलाता है। 

      कोरकू जनजाति की भाषा कोरकू कहलाती है। कोरकू जातिसूचक शब्द ‘कोरो’ (मनुष्य) शब्द में बहुवचन सूचक ‘कू’ प्रत्यय लगाने पर बना है। कोरकू समूह की दो उप बोलियाँ हैं, जो मवासी अथवा मोवासी और नहाली अथवा निहाली कहलाती हैं। यह आस्ट्रिक भाषा परिवार की बोली मानी जाती है, जो खंडवा, बुरहानपुर, हरदा, होशंगाबाद, बैतूल आदि जिलों के साथ ही महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बोली जाती है। कोरकू आस्ट्रो-एशियाई भाषा-परिवार की मुण्डा शाखा की भाषा है। कोरकू समुदाय की बसाहट गोंड समुदाय के आसपास होती है।

   बैगानी प्रमुख रूप से डिण्डौरी, मंडला, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर के साथ ही छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी प्रचलित है। भरियाटी पातालकोट की भारिया जनजाति द्वारा बोली जाती है। इन सभी बोलियों का मौखिक साहित्य इनकी प्राचीनतम ज्ञान-परंपरा को रेखांकित करता है।

   मध्यप्रदेश में जनजातीय बोलियों की स्थिति यदि जनगणना संबंधी आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर देखी जाये तो यह पता चलता है कि इन भाषाओं के प्रयोक्ता जनसंख्या की तुलना में निरंतर कम होते जा रहे हैं। अल्प आबादी वाली जनजातियों द्वारा बहुसंख्यक समुदाय की बोलियों को संपर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लाये जाने के कारण उनकी मातृभाषा विस्मृत होती जा रही है।

      निष्कर्ष रूप में जनजातीय भाषाओं की वर्तमान दशा को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अनुकूल माहौल बनाकर यदि इन्हें खुली हवा में साँस लेने का अवसर उपलब्ध नहीं कराया गया तो जल्दी ही इनका दम घुट जायेगा। इसलिये इनकी सही देखभाल घरों में ही हो सकती है। हर माँ को बच्चे की परवरिश अपनी भाषा में करनी होगी। स्कूल हो,या कार्यस्थल-कहीं भी किसी को अपनी भाषा बोलने से न रोका जाये।ये प्राचीन भाषाएँ बचेंगी तो इनके साथ करोड़ों वर्षों के अनुभव से अर्जित ज्ञान-संपदा भी बचेगी। संतोष की बात है कि वर्तमान मध्यप्रदेश सरकार जनजातीय संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण को लेकर गंभीर है और इनके प्रोत्साहन के अनेक उपाय लगातार कर रही हैं।

जनजातीय गौरव दिवस 15 नवम्बर: भूतो न भविष्यति जनजातीय जननायक भगवान बिरसा मुण्डा

भगवान बिरसा मुण्डा ने अपने 25 वर्ष के जीवन काल में ही जमींदारी प्रथा, राजस्व व्यवस्था इंडियन फारेस्ट एक्ट-1882 और धर्मातरण के खिलाफ अंग्रेजों एवं ईसाई पादरियों से संघर्ष किया। भगवान बिरसा मुण्डा जनजातियों की धार्मिक व्यवस्था, संस्कृति, परम्परा, अस्तित्व एवं अस्मिता रक्षक के प्रतीक हैं।

वे संपूर्ण जनजातीय समाज का गौरव है। भारत सरकार ने बिरसा मुण्डा जयंती – 15 नवम्बर को “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। “जनजातीय गौरव दिवस” मनाना जनजातीय समाज का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण सनातन समाज का एकात्म भाव है।

भारत के विभिन्न प्रान्तों में बसी लगभग 705 जनजातियाँ जब अपने सपूतों की गौरव गाथा को याद करने बैठती हैं तो एक स्वर्णिम नाम उभरता है बिरसा मुण्डा, जिसे जनजातीय बन्धु बड़े प्यार और श्रद्धा के साथ बिरसा भगवान के रूप में नमन करते हैं। जनजातीय समाज ने एक नहीं अनेक रत्न दिए हैं।

मणिपुर के जादोनांग, नागा रानी गाईदिन्ल्यु, राजस्थान के पूंजा भील, आंध्रप्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू, बिहार झारखण्ड के तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू वीर बुधु भगत, नीलाम्बर-पीताम्बर, जीतराम बेदिया, तेलंगा खड़िया, जतरा भगत, केरल के पलसी राजा तलक्ल चंदू, महाराष्ट्र के वीर राघोजी भांगरे, असम में शम्भूधन फुन्गलोसा आदि पर किसे गर्व नहीं होगा? बिरसा मुण्डा इन सबके प्रतीक हैं।

छोटा नागपुर (झारखण्ड) के उलीहातू ग्राम में 15 नवम्बर 1875 के दिन इस वीर शहीद जनजातीय जननायक का जन्म हुआ था। पिता सुगना मुण्डा और माता करमी अत्यन्त निर्धन थे और दूसरे गाँव जाकर मजदूरी का काम किया करते थे। उनके दो भाई एवं दो बहनें भी थीं। बिरसा का बचपन एक सामान्य वनवासी बालक की तरह ही धूल में खेलते, जंगलों में विचरते, भेड़-बकरियाँ चराते और बाँसुरी वादन करते बीता।

बालक बिरसा को उनके पिता पढ़ा-लिखा कर बड़ा साहब बनाना चाहते थे। माता-पिता ने उन्हें मामा के घर आयूबहातू भेज दिया। जहाँ बिरसा ने भेड़-बकरी चराने के साथ शिक्षक जयपाल नाग से अक्षर ज्ञान और गणित की प्रारम्भिक शिक्षा पाई। बिरसा ने बुर्जू मिशन स्कूल में प्राथमिक शिक्षा पाई। आगे की पढ़ाई के लिए वे चाईबासा के लूथरेन मिशन स्कूल में दाखिल हुए।

बिरसा के जीवन में बड़ा बदलाव उनकी स्कूली शिक्षा के दौरान ही आया। उन्हें इसी दौरान अहसास हुआ कि गरीब वनवासियों को शिक्षा के नाम पर ईसाई धर्म के प्रभाव में लाया जा रहा है। उन्होंने इसे अपने और अपने वनवासी भाई-बंधुओं के धर्म पर संकट माना। यह वह समय था जब वनवासियों के अधिकारों और धर्म की रक्षा के लिए ईसाई स्कूलों के विरोध में सरदार आन्दोलन शुरू हुआ था। बिरसा उस आन्दोलन में शामिल हो गये। बिरसा ने बचपन से मुण्डा आदिवासियों के शोषण को करीब से देखा था। आये दिन आदिवासियों पर अंग्रेजी राज के अनाचार से उनके मन में क्रांतिकारी ज्वाला प्रज्ज्वलित हो गयी।

बिरसा ने स्वाध्याय, चिंतन और साधना से स्वयं को परिष्कृत किया और फिर समाज को, अपना धर्म, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति का परिचय कराया। धर्म परिवर्तन का विरोध किया। अपने धर्म के सिद्धांतों को समझाया। कुरीतियों को पाटने और अपनी संस्कृति बचाने के बिरसा के सामाजिक आन्दोलन से लोगों में चेतना जागी, विश्वास जागा। उन्हें अपने पूर्वजों की श्रेष्ठ परम्परा का आभास हुआ और जो लोग जोर-जबरदस्ती शोषण के डर से ईसाई हो गये थे उनकी अपने घर वापसी होने लगी।

बिरसा की चमत्कारी शक्ति और सेवा भावना के कारण वनवासी उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे। वे उन्हें धरती आबा कहकर पुकारते। तभी वर्ष 1893-94 में सिंहभूम, मानभूम, पालामऊ और अन्य क्षेत्रों में खाली पड़ी भूमि को अंग्रेज सरकार ने भारतीय वन अधिनियम के तहत आरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया। इसके अंतर्गत वनवासियों के अधिकारों को कम कर दिया गया। जंगलों पर सरकारी कब्जा कर लिया गया। बिरसा के नेतृत्व में वनवासियों ने याचिका दायर कर अपने अधिकारों की मांग की।

बिरसा ने अपने स्वत्व, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए नारा दिया- ‘अबुआ दिशोम अबुआ राज’

अपना देश अपनी माटी के’ इस क्रांतिकारी नारे ने विदेशी आक्रांताओं के विरोध में वनवासी बंधुओं में अलख जगाई। बिरसा ने लोगों को किसानों का शोषण करने वाली कृषि व्यवस्था के विरोध में उठ खड़ा किया। वनांचल के प्राकृतिक अधिकारों को बहाल करने और लगान माफी के लिए अंग्रेजों के विरोध में मोर्चा खोला। बिरसा को गिरफ्तार करके हजारीबाग जेल में डाल दिया गया। बिरसा का अपराध यह था कि उन्होंने वनवासियों को अपने अधिकारों के लिये संगठित किया था। दो वर्ष बाद वे जेल से छूटे और फिर दिसम्बर 1899 को उनका आन्दोलन शुरू हो गया।

बिरसा ने वनवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति बचाने के इस महासंग्राम को नाम दिया उलगुलान क्रांति। 5 हजार जनजातीय वीरों ने तीर-कमान उठा लिये। बिरसा के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने रांची से लेकर चाईबासा तक पुलिस चौकियों को घेर लिया। पुलिस थानों पर आक्रमण से शुरू हुआ यह संघर्ष अंग्रेजी सेना से सीधे मुकाबले तक जा पहुँचा। अंग्रेजी सेना के पास बन्दूक, बम आदि आधुनिक हथियार थे जबकि वनवासी क्रांतिकारियों के पास मात्र तीर-कमान थे। बड़ी संख्या में क्रांतिकारी मारे गये।

दुर्योग से दो गद्दार अंग्रेजों से जा मिले, जिन्होंने 3 जनवरी 1900 को चक्रधरपुर के जंगल से बिरसा मुण्डा को गिरफ्तार करवा दिया। बिरसा को जंजीरों में जकड़कर रांची जेल भेज दिया गया जहाँ उन्हें कठोर यातनाएँ दी गयी। दिनांक 9 जून 1900 को जेल में ही जहर देकर बिरसा को मार डाला गया।

आदिवीर शहीद बिरसा मुण्डा ने अंग्रेजी राज के धर्म और राष्ट्र को तोड़ने की साजिश को समाज तक पहुँचाया, उनके उलगुलान के संदेश से भयभीत होकर अंग्रेजों ने जमीन अधिग्रहण और नई जमींदारी रोकने के लिये छोटा नागपुर टेनेन्सी कानून पारित किया। वनवासियों के अधिकारों को बहाल कर दिया गया। बिरसा की जनजातीय चेतना ने लोगों को धर्म और राष्ट्र विरोधी विदेशी आक्रांताओं को भारत से बाहर निकालने का मार्ग प्रशस्त किया।

बिरसा मुण्डा का व्यक्तित्व और संघर्ष जनजाति समाज के लिए धर्म, संस्कृति और राष्ट्र रक्षा का प्रतीक है। वे भारतीय जनजातियों के गौरवशाली इतिहास का प्रतिनिधित्व करते हैं इसीलिए उनके जन्म-दिवस को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है।

धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा करने वाले अमर वीर स्वाधीनता सेनानी वनवासियों के धरती आबा बिरसा मुण्डा को कोटिश: प्रणाम।

जनजातीय गौरव दिवस: 15 नवंबर पर विशेष “जनजातीय नायक”

जनजातीय गौरव दिवस – 15 नवंबर 2022 वह विशेष अवसर है जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले जनजातीय नायकों का कृतज्ञ स्मरण प्रासंगिक है। यह स्मरण हमें हमारी स्वतंत्रता के पीछे के त्याग, बलिदान और शौर्य-गाथाओं से तो परिचित करवायेगा ही बल्कि स्वतंत्रता को अक्षुण्ण्रखने के लिए हर कीमत पर भी प्रेरित करेगा। यहाँ प्रस्तुत है देश के और मध्यप्रदेश के कुछ चुनिंदा जनजातीय नायकों के संघर्ष और बलिदानों की संक्षिप्त गाथाएँ :-

भगवान बिरसा मुण्डा

मुण्डा क्रांति के नेतृत्वकर्ता और जन-समुदाय द्वारा बिरसा भगवान के रूप में पूजे जाने वाले बिरसा मुण्डा का जन्म नवंबर 1875 में हुआ था। 1 अक्टूबर 1894 को उनके नेतृत्व में मुण्डाओं ने अंग्रेजों से लगान (कर) माफी के लिये आन्दोलन किया। वर्ष 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। कारावास से मुक्त होने के पश्चात उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया, जो मार्च 1900 में उनकी गिरफ्तारी तक सतत रूप से चलता रहा। कारावास में दी गई यातनाओं और उत्पीड़न के कारण जून 1900 को रांची के कारावास में बिरसा भगवान की जीवन यात्रा समाप्त हुई।

रायन्ना

कित्तूर की रानी चेन्नम्मा के विश्वस्त सेनापति रायन्ना ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। राजा मल्लासरजा और रानी चेन्नम्मा के गोद लिए हुए पुत्र शिवलिंगप्पा को कित्तूर के सिंहासन पर वैध अधिकार दिलाने के लिए इन्होंने कंपनी के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। छापेमार युद्ध शैली का प्रयोग कर इन्होंने बड़े पैमाने पर ब्रिटिश शक्ति को क्षति पहुँचाई। अंततः इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 26 जनवरी 1831 को मृत्युदंड दे दिया गया।

सिद्धो संथाल

सिद्धो मुर्मू का जन्म भोगनाडीह (वर्तमान में झारखण्ड राज्य में) गाँव में एक संथाल परिवार में 1815 ई. में हुआ था। ब्रिटिश शासन का अत्याचारी रूप इस क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा था, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जून 1855 में सिद्धो के नेतृत्व में एक विद्रोह की शुरुआत हुई, जिसे संथाल विद्रोह या हूल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। संथालों ने आक्रामक ब्रिटिश सत्ता, जो तोप, बंदूकों और बड़ी मात्रा में गोला-बारूद से सुसज्जित थी, का सामना अपने परम्परागत तीर-कमान जैसे हथियारों से किया। सिद्धो ने वीरतापूर्वक युद्ध किया, परन्तु पकड़ लिए गए और इन्हें अगस्त 1855 में पंचकठिया नामक स्थान पर फाँसी दे दी गई।

कान्हू संथाल

कान्हू संथाल का जन्म वर्ष 1820 में आज के झारखण्ड राज्य के भोगानाडीह गाँव में हुआ। ये सिद्धो संथाल के छोटे भाई और संथाल विद्रोह के सह नेतृत्वकर्ता थे। कान्हू ने जून 1855 के भीषण संग्राम में अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया और जिसमें इनके दो छोटे भाइयों चाँद और भैरव ने पूर्ण सामर्थ्य से साथ दिया। इस युद्ध में शक्ति और संसाधन पूर्णतः अंग्रेजों के पक्ष में थे। अदम्य साहस के प्रतीक कान्हू गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें भोगनाडीह में ही फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

बाबा तिलका माँझी

संथाल विद्रोह भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध जनजातियों द्वारा प्रतिकार के सर्वप्रथम उदाहरणों में से एक है और इसके नायक थे बाबा तिलका मांझी। भयंकर अकाल और उस पर ब्रिटिश शोषणकारी राजस्व नीतियों के विरुद्ध तिलका मांझी ने शस्त्र उठाये और अत्याचारी कर प्रशासक ऑगस्टस क्लीवलैंड को मार गिराया। ब्रिटिश शक्ति का सामना संसाधनहीन तिलका मांझी और उनके साथी अधिक समय तक न कर सके। अत्यंत क्रूर प्रताड़नाओं के द्वारा फरवरी 1785 में उनकी इहलीला समाप्त हुई।

अल्लूरी यांचाराम राज

वर्ष 1922 के महान रम्या संघर्ष के महानायक अल्लूरी सीताराम राजू ने तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के पूर्व गोदावरी और विशाखापट्टनम क्षेत्रों (वर्तमान आंध्रप्रदेश) में ब्रिटिश शासन को कड़ी चुनौती दी। मद्रास के 1882 के अत्याचारी जंगल कानूनों ने स्थानीय निवासियों की कृषि पर प्रतिबन्ध आरोपित किये थे, जिससे इनका अस्तित्व संकट में आ गया था। अल्लूरी सीताराम राजू ने छापामार शैली द्वारा अंग्रेजों को अनेक अवसर पर पराजित किया। अंततः मई 1924 में उन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर निर्ममतापूर्ण ढंग से उनकी हत्या कर दी गई।

गुण्डाधुर

बस्तर के एक छोटे से गाँव में पले-बढ़े गुण्डाधुर ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने एक लम्बे समय तक अंग्रेजों के दांत खट्टे किये। बस्तर के नेतानार में रहने वाले गुण्डाधुर को उस समय बागा धुरवा के नाम से भी जाना जाता था। वर्ष 1910 में गुण्डाधुर के नेतृत्व में एक छोटे से गाँव से शुरू होने वाले इस विद्रोह ने बस्तर के महान भूमकाल के चरम को प्रदर्शित किया जिससे अंग्रेजों की स्थिति यहाँ डांवाडोल हो गई। गुण्डाधुर को आज भी लोक कथाओं और गीतों के द्वारा एक अमर नायक के रूप में याद किया जाता है।

सुरेन्द्र साय

संभलपुर राज्य के राजकुमार सुरेन्द्र साय ने 18 वर्ष की आयु से जीवनपर्यन्त अंग्रेजों के कुचक्रों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। 23 जनवरी 1809 में संभलपुर के निकट खिंडा में जन्म लेने वाले सुरेन्द्र साय ने गोंड और विंझल जनजातीय समुदायों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सुरेन्द्र साय ने अग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। इस दौरान उनका कार्यक्षेत्र संभलपुर से कालाहांडी और बिलासपुर तक फैला हुआ था। लम्बे संघर्ष के बाद वर्ष 1862 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के असीरगढ़ किले में कैद करके रखा गया, जहाँ 23 मई 1884 को इस महान वीर ने अपनी अंतिम साँस ली।

शंकर शाह

गढ़ा मंडला के पूर्व शासक और महान संग्राम शाह के वंशज, शंकर शाह एक अप्रतिम क्रांतिकारी थे जो युद्ध कला में पारंगत होने के साथ ही साथ काव्य रचना में भी सिद्धहस्त थे। इन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध एक महान सशस्त्र प्रतिरोध का नेतृत्व किया और 18 सितंबर 1857 को जबलपुर में वीरगति को प्राप्त हुए।

झलकारी देवी

वीरांगना झलकारी देवी का जन्म 22 नवम्बर 1830 को झांसी के समीप भोजला नामक ग्राम में हुआ। इनका विवाह महारानी लक्ष्मीबाई के तोपची पूरण सिंह से हुआ था। कालान्तर में अपने साहस और युद्ध कौशल के कारण महारानी लक्ष्मीबाई की सेना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1857 के संग्राम में महारानी लक्ष्मी बाई के नेतृत्व में झलकारी देवी ने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया और युद्ध क्षेत्र में महारानी को सुरक्षित कर, शत्रुओं से सामना करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

रघुनाथ शाह

राजा शंकर शाह के पुत्र और गढ़ा मंडला के शौर्य के ध्वज वाहक रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। जबलपुर स्थित ब्रिटिश सेना को संघर्ष के लिए प्रेरित किया, जिसने इस क्षेत्र के अंग्रेजों के हृदय में महान भय का संचार कर दिया। 18 सितंबर 1857 को जबलपुर में अपने पिता शंकर शाह के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।

टंट्या भील

अपनी लोककल्याणकारी छवि के चलते मामा के नाम से प्रसिद्ध क्रांतिकारी टंट्या भील ने कई वर्षों तक ब्रिटिश शासन को चैन की साँस नहीं लेने दी और उनके लिए एक चुनौती बने रहे। वर्ष 1874 से अपनी गिरफ्तारी तक इन्होंने अनेक अवसरों पर सरकारी खजानों को लूटा और उसे जन-साधारण में बाँट दिया। जीवन के अंतिम समय में गिरफ्तार कर लिये गये और पहले इंदौर तथा बाद में जबलपुर की जेल में रखा गया। इस दुर्घर्ष योद्धा को ब्रिटिश शासन ने 19 अक्टूबर 1889 को मृत्युदण्ड दिया ।

खाज्या नायक

सन् 1857 की क्रांति के जनजातीय नायकों में से एक खाज्या नायक ने सन् 1856 से कम्पनी के विरुद्ध विद्रोह छेड़ दिया और एक बड़ी सेना एकत्र की। बड़वानी और इसके आसपास के क्षेत्रों में खाज्या का प्रभाव फैल गया। सन् 1857 की क्रांति के समापन के बाद भी खाज्या नायक ने ब्रिटिश शासकों को चैन नहीं लेने दिया। यह वीर नायक धोखे का शिकार हुआ और अक्टूबर 1860 को वीरगति को प्राप्त हुआ ।

अमर बलिदानी डेलन शाह

अमर बलिदानी डेलन शाह का जन्म सन् 1802 में नरसिंहपुर जिले के मनदपुर में हुआ था। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में गोंड जनजाति के वीर योद्धा डेलन शाह युवावस्था से ही अंग्रेजों से संघर्ष करने लगे थे। मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने चौरागढ़ में अंग्रेजों के किले पर आक्रमण कर दिया था। उन्होंने उनका झंडा यूनियन जैक भी उखाड़ फेंका परंतु गढ़ पर अधिकार नहीं कर पाए। पुनः सेना संगठित कर वर्ष 1836 में उन्होंने दूसरा प्रयास किया, पर सफल नहीं हुए। वर्ष 1857 की क्रांति में उन्होंने तीसरा प्रयास किया और चांवरपाठा तथा तेंदूखेड़ा दोनों को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतंत्र करा लिया। वर्ष 1858 में अंग्रेज बड़ी सेना लेकर आए और डेलन शाह को बंदी बना लिया। ढिलवार में ही 16 मई 1858 को वीर डेलन शाह को पीपल के पेड़ पर फाँसी दे दी गई।

भीमा नायक

तत्कालीन बड़वानी राज्य के पंचमोहली क्षेत्र में जन्में भीमा नायक ने सन् 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती प्रस्तुत की। भीमा नायक का प्रभाव क्षेत्र पश्चिम में राजस्थान के क्षेत्रों से लेकर पूर्व में नागपुर तक फैल चुका था। महान क्रांतिकारी तात्या टोपे के साथ इनका लगातार संपर्क रहा। सन् 1867 में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अभियोजन में दोष सिद्ध करार दे दिए जाने के पश्चात पोर्टब्लेयर भेज दिया गया जहाँ 29 दिसम्बर 1876 में इन्होंने आखिरी साँस ली।

सीताराम कंवर

सन् 1857 की क्रांति के दौरान होलकर और बड़वानी राज्य के नर्मदा पार के क्षेत्र, जिनमें आज का निमाड़ क्षेत्र सम्मिलित है, में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक बड़े विद्रोह का नेतृत्व सीताराम कंवर ने किया। कंवर ने सतपुड़ा श्रेणी के भीलों को विदेशी शासन उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया और पेशवा तथा तात्या टोपे के साथ गहन संपर्क स्थापित किया। कंपनी की शक्तिशाली सेना का सामना यह महान नायक अपनी सीमित शक्ति एवं संसाधनों के साथ करता रहा। अक्टूबर 1858 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और इस कैद के दौरान ही उन्होंने संसार से विदा ली।

रघुनाथ सिंह मंडलोई

रघुनाथ सिंह मंडलोई, जो टांडा बरूद के निवासी थे और स्थानीय भील एवं भिलाला समुदाय के प्रतिष्ठित नेतृत्वकर्ता थे, ने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हुए एक सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। इनके प्रभाव के कारण निमाड़ क्षेत्र में विदोह की ज्वाला धधक उठी। अंग्रेजी कम्पनी की सेना ने इन्हें अक्टूबर 1858 में बीजागढ़ के किले में घेर लिया और इन्हें बंदी बना लिया गया। इसके पश्चात उनके जीवन से संबंधित किसी भी घटना का उल्लेख अप्राप्य है।

टूरिया शहीद मुड्डे बाई

जब गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध नमक कानून तोड़ा, तब देश भर में इस तरह के आन्दोलनों का प्रारंभ हुआ था। इसी क्रम में मध्यप्रदेश में जंगल कानून भंग करने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। सिवनी जिले के टुरिया ग्राम में ऐसे ही जंगल सत्याग्रह के दौरान अत्याचारी ब्रिटिश शासन के दमन के चलते 9 अक्टूबर 1930 को मुड्डेबाई शहीद हो गईं। इनके साथ ही साथ इसी ग्राम की रैनो बाई और बिरजू भोई भी इस गोलीकाण्ड में शहीद हुए।

मंशु ओझा

सन् 1942 के ऐतिहासिक भारत छोड़ो आन्दोलन में बैतूल के मंशु ओझा ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अनेक क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। नवम्बर 1942 में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 20 जुलाई 1944 तक नरसिंहपुर जेल में कैद रखकर इन्हें कठोर यातनाएँ दी गई। घोड़ाडोंगरी जिला बैतूल में 28 अगस्त 1981 को उनका देहावसान हुआ।

जनजातीय गौरव दिवस पर विशेष: जनजातीय वर्ग के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है मध्यप्रदेश सरकार

जनजातीय गौरव दिवस पर विशेष: जनजातीय वर्ग के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है मध्यप्रदेश सरकार: मध्यप्रदेश को यह गौरव हासिल है कि यह देश की सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या का घर है। प्रदेश का इन्द्रधनुषीय जनजातीय परिदृश्य अपनी विशिष्टताओं की वजह से मानव-शास्त्रियों, सांस्कृतिक अध्येताओं, नेतृत्व शास्त्रियों और शोधार्थियों के विशेष आकर्षण का केन्द्र रहा है। यहाँ की जनजातियाँ सदैव से अपनी बहुवर्णी संस्कृति, भाषाओं, रीति-रिवाज और देशज तथा जातीय परम्पराओं के साथ प्रदेश के गौरव का अविभाज्य अंग रही है।

लम्बे समय तक प्रदेश का जनजातीय समुदाय अपनी इन तमाम विशिष्टताओं के बावजूद विकास की मुख्य-धारा से लगभग अलग-थलग रहा, पर अब यह स्थिति बदल रही है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पिछले अठारह वर्षों में प्रदेश की जनजातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में व्यापक बदलाव आया है। अब वे अपनी गौरवशाली परम्पराओं के साथ आधुनिक समय के साथ कदमताल करते हुए अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ मुख्य धारा में है और सरकारी सर्वोच्च प्राथमिकता में।

इन 18 वर्ष में प्रदेश में जनजातीय वर्गों के कल्याण के लिये सबसे बड़ा काम जनजातीय वर्गों की आबादी के अनुपात में बजट में राशि के प्रावधान का हुआ। वर्ष 2003-04 में जनजातीय कार्य विभाग का बजट 746.60 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2022-23 में 10 हजार 353 करोड़ रुपये का हो गया है। इस प्रकार बजट में 948 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

प्रदेश के सभी 89 जनजातीय विकासखण्डों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ग्राम स्तर तक राशन पहुँचाने के लिए “मुख्यमंत्री राशन आपके ग्राम” योजना लागू की गई है। अब तक 472 जनजातीय युवाओं को योजना के राशन वाहन हेतु 10 करोड़ 80 लाख रूपये की मार्जिन मनी की वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी गई है।

सभी 89 जनजातीय विकासखण्ड में गर्भवती महिलाओं एवं 6 माह के बच्चों से 25 वर्ष तक के युवाओं में सिकलसेल रोग की रोकथाम के लिए हीमोग्लोबिनोपैथी मिशन लागू कर सिकल सेल स्क्रीनिंग, रोकथाम, प्रबंधन, जैनेटिक काउंसलिंग एवं जन-जागरूकता का कार्य किया जा रहा है।

प्रदेश में प्रतिवर्ष 15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस मनाया जा रहा है। जनजातीय जननायकों की स्मृतियों को चिरस्थायी बनाने के लिए स्मारक और संग्रहालय बन रहे हैं। हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति, पातालपानी रेलवे स्टेशन का नाम टंट्या मामा के नाम पर किया गया है। इन्दौर में भंवरकुआँ चौराहे पर टंट्या मामा की मूर्ति स्थापित की गई। छिन्दवाड़ा विश्वविद्यालय का नामकरण राजा शंकरशाह विश्वविद्यालय और मंडला मेडिकल कॉलेज का नामकरण राजा ह्दयशाह मेडिकल कॉलेज किया गया है। क्रान्तिसूर्य टंट्या मामा के बलिदानों का स्मरण करते हुए इस वर्ष गौरव कलश यात्रा का आयोजन किया गया।

जनजातीय युवाओं को स्व-रोजगार के नए अवसर उपलब्ध करवाने के लिये प्रदेश में इसी वर्ष से तीन नयी योजनाएँ – भगवान बिरसा मुण्डा स्व-रोज़गार योजना, टंट्या मामा आर्थिक कल्याण योजना और मुख्यमंत्री अनुसूचित जनजाति विशेष परियोजना वित्त पोषण योजना लागू की गई है। साथ ही सरकारी नौकरियों में बेकलॉग के पदों पर भर्ती की कार्रवाई भी की जा रही है।

अंग्रेजों के समय से सरकार के पास जंगलों का स्वामित्व था। अब मध्यप्रदेश में कीमती सागवान लकड़ी के साथ ही अन्य वन संपदा की 20 प्रतिशत राशि के मालिक वनवासी होंगे। प्रदेश में गौण वनोपजों के प्रबंधन का अधिकार अब ग्राम सभा को है। वनाधिकार कानून के अंतर्गत भी कुल 2 लाख 70 हजार 815 व्यक्तिगत और करीब 30 हजार सामुदायिक दावे मान्य किये गये हैं। जनजातीय बहुल क्षेत्रों में औषधीय और सुंगधित पौधों की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए “देवारण्य योजना” लागू की गई है।

मध्यप्रदेश के 26 जिलों के 827 वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में परिवर्तित करने की शुरूआत कर दी गई है। वन ग्रामों के राजस्व ग्राम बन जाने से बँटवारा और नामांतरण होने के साथ फसलों की गिरदावरी भी हो सकेगी।

मेडिकल, इंजीनियरिंग और पॉलीटेक्निक की पढ़ाई हिन्दी भाषा में प्रारंभ होने से जनजातीय वर्ग के उन विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा जो दूरस्थ अंचलों में मातृभाषा में पढ़ाई कर बड़े हुए हैं।

अनुसूचित जनजातियों के एक हेक्टेयर तक की भूमि वाले एवं 5 हार्स पावर भार के कृषि उपभोक्ताओं को नि:शुल्क विद्युत प्रदाय किया जा रहा है। विमुक्त जनजातियों के कल्याण के लिए राज्य सरकार ने प्रतिवर्ष 31 अगस्त को “विमुक्त जाति दिवस” मनाने का निर्णय भी लिया है।

वर्ष 2003-04 से सितम्बर 2022 तक मुख्य विभागीय संस्थाओं एवं योजनाओं में वृद्धि:

संस्था वर्ष 2003-04 सितम्बर 2022

  • • प्राथमिक शाला 12643 22913
  • • माध्यमिक शाला 4369 6788
  • • हाई स्कूल 510 1109
  • • उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 476 898
  • • आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 08 08
  • • कन्या शिक्षा परिसर/मॉडल स्कूल 03 89
  • • एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय 00 63
  • • सी.एम. राईज विद्यालय 00 95
  • • विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति 10 (प्रतिवर्ष) 50 (प्रतिवर्ष)
  • • खेल परिसर 14 26
  • • छात्रावास/आश्रम 1166 2672
  • (पहली कक्षा से महाविद्यालयीन शिक्षा तक)
  • • शिष्यवृत्ति की दरें (प्रतिमाह) बालक-350 बालक-1460
  • बालिका-360 बालिका-1500
  • • राज्य छात्रवृत्ति 8.42 लाख 24.62 लाख
  • (प्री और पोस्ट मेट्रिक) विद्यार्थी विद्यार्थी
  • • प्री-पोस्ट मेट्रिक छात्रवृत्ति राशि 49.06 करोड़ 435.62 करोड़

आवास सहायता योजना

ऐसे महाविद्यालयीन विद्यार्थियों, जिन्हें छात्रावास की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है, के लिए वर्ष 2013-14 से आवास सहायता योजना प्रारंभ की गई है। विद्यार्थियों को मध्यप्रदेश में होने वाली आवास सहायता इस प्रकार है- संभागीय मुख्यालय पर 2,000 रुपये प्रतिमाह, जिला मुख्यालय पर 1,250 रुपये प्रतिमाह और विकासखंड/ तहसील मुख्यालय पर 1,000 रुपये प्रतिमाह। इस वर्ष अब तक 1 लाख 01 हजार विद्यार्थियों को आवास सहायता दी गई है।

छात्रवृत्ति योजनाओं में नवाचार

प्रदेश के अनुसूचित जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों के लिए कक्षा 01 से पी.एच.डी. तक अध्ययनरत रहने पर प्रत्येक स्तर पर छात्रवृत्ति योजनाएँ संचालित हैं। इन योजनाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर उन्हें सरल एवं लाभकारी बनाया गया है। कक्षा 01 से 05 में अध्ययनरत अनुसूचित जनजाति वर्ग की बालिकाओं (एवं विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह PVGT के बालकों को भी देय) को देय 15 रुपये प्रतिमाह के मान से 10 माह हेतु 150 रुपये की राशि को वर्ष 2017-18 से बढ़ाकर 25 रुपये प्रति विद्यार्थी प्रतिमाह अर्थात 10 माह हेतु 250 रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया है। इसी प्रकार कक्षा 5 में अध्ययनरत बालिकाओं की 50 रुपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति को बढ़ाकर 60 रुपये प्रतिमाह किया गया है। अब यह छात्रवृत्ति 10 माह हेतु 600 रुपये देय है।

महाविद्यालयीन छात्रवृत्ति योजना में शासकीय एवं शासकीय स्ववित्तपोषी संस्थाओं में अध्ययनरत अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति की पात्रता के लिये आय सीमा के बंधन को वर्ष 2017-18 से समाप्त कर दिया गया है। पहले यह सीमा प्रतिवर्ष अधिकतम 3 लाख रुपये तक थी। योजना में अशासकीय संस्थाओं के अनुसूचित जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति की पात्रता हेतु आय सीमा का बंधन वर्ष 2017-18 से 6 लाख वार्षिक कर दिया गया है। पहले यह सीमा प्रतिवर्ष अधिकतम 3 लाख तक थी। इस निर्णय से लगभग 1 लाख 30 हजार विद्यार्थी प्रति वर्ष लाभान्वित हो रहे हैं। इसी तरह वर्ष 2017-18 से ही अशासकीय संस्थाओं में अध्ययनरत अनुसूचित जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों को प्रवेश एवं शुल्क विनियामक समिति और विश्वविद्यालय फीस विनियामक आयोग द्वारा निर्धारित शुल्क दिए जाने का प्रावधान किया गया है। पहले यह प्रावधान मात्र 7 पाठ्यक्रम तक सीमित था।

आकांक्षा योजना

वर्ष 2018-19 से अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थाओं के माध्यम से इन्दौर, जबलपुर, भोपाल एवं ग्वालियर संभाग मुख्यालय पर कोचिंग की यह योजना लागू की गई है। प्रत्येक केन्द्र पर इंजीनियरिंग के लिये 200, मेडिकल 100 एवं क्लेट के 100 कुल 400 विद्यार्थियों को कक्षा 11वीं और 12वीं में अध्ययन के साथ-साथ आवासीय सुविधायुक्त दो वर्षीय कोचिंग प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थाओं के माध्यम से दी जा रही है।

विशेष पिछड़ी जनजाति परिवारों को आहार अनुदान

विशेष पिछड़ी जनजातियाँ सहरिया, बैगा और भारिया के परिवार की महिला मुखिया को कुपोषण से मुक्ति के लिए आहार अनुदान के रूप में प्रतिमाह 1 हजार रुपये प्रदान किये जा रहे हैं। यह राशि सीधे उनके खाते में जमा की जा रही है। दिसम्बर 2017 से संचालित इस योजना में इस वर्ष 23 लाख 35 हजार 700 हितग्राहियों को 164 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर के क्रीड़ा परिसर

अनुसूचित जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए जिला स्तर पर 5 बालक क्रीड़ा परिसर इन्दौर, उमरिया, श्योपुर, खरगोन और शहडोल तथा 3 कन्या क्रीड़ा परिसर डिण्डोरी, धार और झाबुआ में निर्माणाधीन हैं। इन परिसर में तीरंदाजी, जिम्नोजियम, बेडमिंटन, टेबिल टेनिस, स्क्वैश, वेलोड्रोम, रॉक क्लाइम्बिंग एवं बोल्डरिंग तथा स्वीमिंग विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाना है।

छिन्दवाड़ा, डिण्डोरी एवं श्योपुर में विशेष पिछड़ी जनजाति की कला-संस्कृति के संरक्षण के लिए सांस्कृतिक/ संग्रहालय/ स्मारक आदि की स्थापना की जा रही है। प्रत्येक की लागत 590 लाख रुपये है। छिन्दवाड़ा में प्रदेश के जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को समर्पित बादल भोई राज्य आदिवासी संग्रहालय का निर्माण 30 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है। राजा शंकरशाह-रघुनाथ शाह के बलिदान की स्मृति में जबलपुर में 5 करोड़ रुपये की लागत से स्मारक का निर्माण किया जा रहा है।

कम्प्यूटर कौशल विकास केन्द्र

छिन्दवाड़ा, शहडोल, मण्डला, शिवपुरी एवं श्योपुर में विशेष पिछड़ी जनजाति युवाओं के लिए कम्प्यूटर कौशल विकास केन्द्रों की स्थापना की जा रही है। प्रत्येक की लागत एवं संचालन व्यय राशि 5 करोड़ 97 लाख रुपये है।

सरकार ने युवाओं को विशेष कौशल प्रशिक्षण

प्रदेश के जनजातीय वर्ग के युवक-युवतियों के कौशल विकास के लिये विभिन्न सेक्टर्स/ कोर्स में शॉर्ट टर्म निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था की है। बैगा, भारिया और सहरिया जनजाति के लिए शहडोल, डिण्डौरी, मण्डला, तामिया और शिवपुरी में कम्प्यूटर कौशल विकास प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से दो माह का डोमेस्टिक डाटा एण्ट्री आपरेटर का निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। सफल प्रशिक्षार्थियों का प्लेसमेंट भी हुआ।

इसके अलावा जनजातीय गाँव में चार व्यक्तियों को ग्रामीण इंजीनियर के रूप में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे विभिन्न कार्य जैसे भवन निर्माण, उपकरणों को सुधारने जैसे तकनीकी कौशल विकास के साथ ग्रामीण युवाओं को अपने ही गाँव में अतिरिक्त आय के अवसर मिल रहे हैं।

पुलिस और फौज की भर्ती और ट्रेनिंग के लिये प्रशिक्षण

जनजातीय युवाओं को पुलिस और फौज में भर्ती और ट्रेनिंग के लिये प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। इसमें हर वर्ष लगभग 1500 युवाओं को 60 दिवसीय प्रशिक्षण दिया जायेगा।

छात्रावास और आश्रम से घर से दूर पढ़ाई हुई आसान

राज्य सरकार द्वारा जनजातीय वर्ग के छात्र-छात्राओं को कक्षा एक से लेकर महाविद्यालयीन शिक्षा तक निःशुल्क आवासीय सुविधा उपलब्ध करवाई जा रही है। प्रदेश में 2 हजार 672 छात्रावास और आश्रम संचालित है, जिनकी क्षमता एक लाख 51 हजार है। जनजातीय वर्ग के लिये प्रदेश में 247 विशिष्ट शैक्षणिक संस्थाएँ, 63 एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय, 89 कन्या शिक्षा परिसर/ मॉडल स्कूल का संचालन हो रहा है और 95 सी.एम. राइज स्कूल तैयार किये जा रहे हैं।

तेन्दूपत्ता संग्राहकों का कल्याण

राज्य सरकार लघु वनोपज संग्राहकों को बिचौलियों के शोषण से बचाकर उन्हें संग्रहीत लघु वनोपज का उचित लाभ दिलाने के लिये संकल्पित है। वर्ष 2007 में तेन्दूपत्ता संग्रहण दर जहाँ रुपये 450 प्रति मानक बोरा थी वहीं अब यह दर बढ़ाकर रुपये 3,000 प्रति मानक बोरा कर दी गयी है। केवल मई-जून, 2022 में ही संग्राहकों को लगभग 560 करोड़ रुपये संग्रहण पारिश्रमिक के रूप में वितरित किए गए हैं। इस वर्ष संग्रहण वर्ष 2021 के लिए 825 समितियों को रुपये 234 करोड़ की बोनस राशि वितरित की जायेगी।

संग्रहण पारिश्रमिक के साथ-साथ तेन्दूपत्ता के व्यापार से अर्जित शुद्ध लाभ भी ग्रामीणों के साथ बाँटा जाता है। वर्ष 1998 में शुद्ध लाभ का 50 प्रतिशत अंश संग्राहकों को बोनस के रूप में वितरित किया जाता था, जिसे अब बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है। विगत 10 वर्षों के संग्रहण काल का 2 हजार करोड़ रुपये संग्राहकों को बोनस के रूप में वितरित किये जा चुके हैं।

तेन्दूपत्ता संग्राहकों के लिये वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री तेन्दूपत्ता संग्राहक कल्याण सहायता योजना भी प्रारंभ की गयी। योजना में अभी तक 1,893 संग्राहकों को राशि 8 करोड़ 45 लाख की बीमा सहायता प्रदान की गयी है। इस वर्ष से तेन्दूपत्ता संग्राहकों को और अधिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से उन्हें संबल योजना में शामिल कर लिया गया है।

संग्राहकों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2011 में “एकलव्य वनवासी शिक्षा विकास योजना” प्रारंभ की। अभी तक 12 हजार 223 मेधावी छात्रों को राशि रुपये 1,247 करोड़ की सहायता दी जा चुकी है।

लघु वनोपज संग्राहकों को वनोपज का उचित मूल्य दिलाने के लिये राज्य शासन द्वारा महुआ, चिरोंजी, अचार गुठली, हर्रा, आंवला, बहेड़ा जैसी 32 प्रमुख लघु वनोपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी घोषित किया गया है। इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 31 हजार क्विंटल महुआ फूल, 248 क्विंटल शहद, 10.75 क्विंटल आचार गुठली, 15.41 क्विंटल नीम बीज, 15.66 क्विंटल ईमली बीज सहित, 1.30 क्विंटल बेलगुदा, इस प्रकार कुल राशि रुपये 12 करोड़ की वनोपज की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की गई है।

प्रदेश में प्रधानमंत्री वन विकास योजना के तहत 86 वन धन केन्द्रों की स्थापना की स्वीकृति दी जा चुकी है। इनमें से 67 वन धन केन्द्रों द्वारा प्र-संस्करण उत्पाद निर्माण भी प्रारंभ कर दिया गया है।

भारत की प्रथम महिला नागरिक श्रीमती द्रौपदी मुर्मू दो दिवसीय प्रवास पर रहेंगी मध्यप्रदेश में

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 15-16 नवंबर को मध्यप्रदेश प्रवास पर रहेंगी। वे 15 नवंबर को शहडोल के लालपुर में जनजातीय गौरव दिवस के राज्य-स्तरीय कार्यक्रम में शामिल होंगी और इसी दिन शाम को भोपाल से दो परियोजनाओं का वर्चुअल शिलान्यास करेंगी। राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु 16 नवंबर को मोतीलाल नेहरू स्टेडियम भोपाल में महिला स्व-सहायता समूह सम्मेलन में सम्मिलित होंगी।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु 15 नवंबर को प्रात: 11:30 बजे जबलपुर आयेंगी और वहाँ से दोपहर 12.25 पर शहडोल पहुँचेंगी। दोपहर 1:45 बजे लालपुर (शहडोल) में जनजातीय गौरव दिवस में शामिल होंगी। राष्ट्रपति दोपहर 3 बजे शहडोल से प्रस्थान कर अपरान्ह 3:55 जबलपुर और वहाँ से सायं 5:25 बजे भोपाल पहुँचेंगी।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु सायं 6:30 बजे राजभवन, भोपाल से सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रातापानी, औबेदुल्लागंज-इटारसी फोरलेन परियोजना (एनएच-46) और रक्षा मंत्रालय की ग्वालियर स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में मेक्सिमम माइक्रोवाइल कंटेनमेंट लेबोरेट्ररी (बीएसएल 4) का वर्चुअली शिलान्यास करेंगी।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु 16 नवंबर को प्रात: 11:30 बजे मोतीलाल नेहरू स्टेडियम में महिला स्व-सहायता समूह सम्मेलन में भाग लेंगी। राष्ट्रपति दोपहर 12:55 बजे भोपाल से वायुयान द्वारा दिल्ली के लिये प्रस्थान करेंगी।

जनजातीय गौरव दिवस

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर लालपुर, शहडोल में जनजातीय गौरव दिवस के राज्य स्तरीय कार्यक्रम में शामिल होंगी। राष्ट्रपति द्वारा इस दौरान मध्यप्रदेश में पेसा एक्ट को आधिकारिक तौर पर लागू भी किया जायेगा। राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल, मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री अर्जुन मुंडा, केन्द्रीय इस्पात एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते, प्रदेश की जनजातीय कार्य एवं अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री श्रीमती मीना सिंह मांडवे, वन मंत्री कुं. विजय शाह, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री श्री बिसाहूलाल सिंह और पशुपालन एवं सामाजिक न्याय मंत्री श्री प्रेमसिंह पटेल उपस्थित रहेंगे।

रातापानी औबेदुल्लागंज-इटारसी राजमार्ग का फोरलेन में उन्नयन

राष्ट्रपति द्वारा वर्चुअल शिलान्यास की जाने वाली यह परियोजना भारतमाला परियोजना में एनएच-46 (पुराना एनएच-69) औबेदुल्लागंज से बैतूल इंटर कोरिडोर मार्ग का एक हिस्सा ही है, जो भोपाल से नागपुर को कनेक्टिविटी देता है।

इस मार्ग का 12.38 किमी. का खण्ड रातापानी वन्य-जीव अभयारण्य में आता है एवं रातापानी खण्ड भोपाल-नागपुर कॉरिडोर का अधूरा भाग है। परियोजना में वन्य-जीव और पर्यावरण की सुरक्षा के लिये आवश्यक सभी शमन उपाय शामिल हैं। वन्य-जीव अभयारण्य क्षेत्र में पशु अंडरपास के प्रावधानों से वन्य-प्रणियों को आवागमन में आसान होगी।

परियोजना की कुल लंबाई 12.38 किमी. है। इसके निर्माण पर 417 करोड़ 51 लाख रूपये की लागत आयेगी। परियोजना का निर्माण कार्य 18 माह की अवधि में पूर्ण किया जायेगा। इस मार्ग को चौड़ा करने से वन्य-प्राणियों के आवागमन/आवास पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए 5 बड़े पशु अंडरपास (100मी., 420मी., 1226मी., 65मी. एवं 65मी.) एवं 2 छोटे पशु अंडरपास (10मी. एवं 10मी.) अधो-संरचनाएँ बनाई जायेंगी। परियोजना में एक माइनर ब्रिज एवं 2 व्हीकल अंडरपास का निर्माण भी किया जाना है।

परियोजना के लाभ

  • भोपाल, होशंगाबाद, बैतूल और नागपुर की बेहतर कनेक्टिविटी।
  • भारी यातायात से सड़क उपयोगकर्ता को सुविधा।
  • रातापानी वन्य-जीव अभयारण्य और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व तक बेहतर आवागमन से पर्यटन क्षेत्र को बढावा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
  • समय और ईंधन की बचत के साथ प्रदूषण में कमी।
  • सड़क उपयोगकर्ता की सुरक्षा में सुधार।
  • क्षेत्र के लोगों की सामाजिक और आर्थिक समृद्धि।

मध्यप्रदेश समाचार: ओंकारेश्वर के बाद अब बरगी और गांधी सागर जलाशयों में फ्लोटिंग प्लांट लगाने पर विचार कर रही प्रदेश सरकार

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से आज शाम निवास पर यूएस के कॉन्सुलेट जनरल (महा वाणिज्य दूत) श्री मिचेल हेंकी ने सौजन्य भेंट की। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने श्री हेंकी को जनवरी में हो रही ग्लोबल इंवेस्टर समिट के लिए भी आमंत्रित किया। श्री हेंकी ने कहा कि भोपाल के कुदरती सौन्दर्य ने उन्हें प्रभावित किया है।

मुख्यमंत्री चौहान ने श्री हेंकी का प्रदेश की जनता की ओर से स्वागत करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश, देश का हृदय प्रदेश है। प्रधानमंत्री श्री मोदी के आहवान पर स्वच्छता के क्षेत्र में मध्यप्रदेश देश में सबसे आगे है।

नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में रीवा जिले में स्थापित “रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट” एक प्रमुख परियोजना है जिसकी लागत 4 हजार 500 करोड़ रूपए और क्षमता 750 मेगावाट है। ओंकारेश्वर में सौर ऊर्जा से संचालित फ्लोटिंग संयंत्र की स्थापना की पहल की गई है। भविष्य में बरगी और गांधी सागर जलाशय पर भी ऐसे संयंत्र लगाने का विचार है।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि भारत और यूएस के मध्य विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की व्यापक संभावनाएँ हैं। द्विपक्षीय व्यापार और निवेश की प्राथमिकताओं पर कार्य के लिए यह बैठक महत्वपूर्ण है। गत तीन वर्ष में मध्यप्रदेश से यूएस में होने वाले निर्यात में वृद्धि हुई है।

वर्ष 2019-20 में 1.05 बिलियन यूएस डालर का निर्यात हुआ, वहीं यह आंकड़ा वर्ष 2020-21 में बढ़ कर 1.28 और वर्ष 2021-22 में बढ़ कर 1.43 बिलियन यूएस डालर हो गया है। मुख्य रूप से जो उत्पाद मध्यप्रदेश से यूएस निर्यात होते हैं उनमें बासमती चावल, दवाइयाँ, सूती वस्त्र, खाद्य तेल आदि शामिल हैं।

यूएस और मध्यप्रदेश के बीच सहयोग की संभावनाएँ

मुख्यमंत्री चौहान ने बताया कि निवेश के रूप में मध्यप्रदेश की केंद्रीय और आदर्श भूमिका है। देश के करीब 60 प्रतिशत भू-भाग को मध्यप्रदेश से आसानी से कवर किया जा सकता है। राज्य सरकार द्वारा निवेशकों से नियमित संवाद होता है।

यू.एस. एवं मध्यप्रदेश की उन्नत विनिर्माण, रिन्यूएबल एनर्जी, मशीनरी इक्विपमेंट्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा और चिकित्सा उपकरण क्षेत्रों में साझेदारी है। इसे यू.एस. एवं मध्यप्रदेश की सरकारी संस्था एमपीआईडीसी और यूएसटीडीए के मध्य एमओयू कर और आगे ले जाया जा सकता है।

प्रदेश में कृषि विकास, उद्यानिकी और खाद्य प्र-संस्करण के क्षेत्र में बहुत अच्छा आधार स्थापित है। मध्यप्रदेश, भारत में गेहूँ का सबसे बड़ा निर्यातक राज्य है। इस क्षेत्र में भी यूएस के साथ साझेदारी कर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर निवेश की संभावनाएँ तलाशी जा रही हैं।

कौशल विकास एवं प्रशिक्षण, नवाचार और अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में सेंटर ऑफ एक्सीलेन्सेस, इन्क्यूबेशन सेंटर और कॉमन फेसिलिटी सेंटर को यूएस कंपनियों के साथ साझेदारी कर स्थापित करने के प्रयास हैं। प्रदेश में स्मार्ट सिटी विकास में साझेदारी एवं नवाचार के नवीन अवसर खोजने का कार्य भी प्राथमिकता में शामिल है।

मध्यप्रदेश इन्फ्रा-स्ट्रक्चर (सड़क), वित्तीय और नवकरणीय क्षेत्रों में अधिक निवेश के लिए प्रयासरत है। प्रदेश में चयनित ओडीओपी उत्पादों को अमेरिका में विपणन के अवसर प्रदान करने की संभावनाएँ विद्यमान हैं। “स्टार्ट योर बिजनेस इन थर्टी डेज” की व्यवस्था का लाभ उद्यमियों को मिल रहा है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि मध्यप्रदेश में कानून-व्यवस्था की मजबूत स्थिति से उद्योगों के अनुकूल वातावरण है। आपराधिक तत्वों को सिर उठाने नहीं दिया जाता। मानवता को क्षति पहुँचाने वाले तत्वों को क्रश कर देने का संकल्प है।

महिला सशक्तिकरण के प्रयासों, कचरे से ऊर्जा उत्पादन का कार्य कर वेस्ट टू वेल्थ में मध्यप्रदेश आगे है। ग्रीन एनर्जी और फार्मा सेक्टर का निरंतर विकास हो रहा है। चर्चा के दौरान औद्योगिक नीति और निवेश प्रोत्साहन विभाग के प्रमुख सचिव श्री मनीष सिंह भी उपस्थित थे।

Web Title: Madhya Pradesh News: After Omkareshwar, now the state government is considering setting up floating plants in Bargi and Gandhi Sagar reservoirs

मप्र में ठंड बरपाने लगी कहर, इन जिलों में 10 डिग्री हुआ न्यूनतम तापमान

भोपाल। उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले दिनों हुई बर्फबारी का असर मध्य प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है। वर्तमान में प्रदेश के मौसम को प्रभावित करने वाली कोई मौसम प्रणाली सक्रिय नहीं है और हवा का रुख भी उत्तरी बना हुआ है।

इसी वजह से मध्य प्रदेश में तापमान गिरने लगा है और ठंड भी बढ़ती जा रही है।

रविवार को प्रदेश के अधिकांश जिलों में न्यूनतम तापमान में कमी आई है। इस दौरान सबसे कम न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस नौगांव में दर्ज किया गया, जो कि इस सीजन का अब तक का सबसे कम तापमान रहा।

भोपाल के मौसम विज्ञान केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले 24 घंटों के दौरान प्रदेश के सभी संभागों का मौसम मुख्यत: शुष्क रहा और सभी जिलों में न्यूनतम तापमान में गिरावट दर्ज की गई।

मौसम विभाग ने सोमवार-मंगलवार को भी मौसम का मिजाज इसी तरह रहने की संभावना जताई है। उसके बाद रात के तापमान में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है।

भोपाल मौसम विज्ञान केंद्र के पूर्व वरिष्ठ मौसम विज्ञानी अजय शुक्ला ने बताया कि वर्तमान में हवा का रुख उत्तरी रहने से राजधानी सहित प्रदेश के अधिकतर जिलों में न्यूनतम एवं अधिकतम तापमान में गिरावट हो रही है। अगले दो दिन मौसम का मिजाज इसी तरह बना रहने का अनुमान है।

उन्होंने बताया कि हालांकि वर्तमान में एक पश्चिमी विक्षोभ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच में बना हुआ है। इसके सोमवार को आगे बढ़ने की संभावना है। इस नये सिस्टम से एक प्रेरित चक्रवात के भी बनने के संकेत मिले हैं। प्रति चक्रवात बनने से हवाओं का रुख बदलने से मध्य प्रदेश में न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी होने आसार हैं।

ज्ञानवापी मामला: ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक की मांग वाली याचिका पर आज सुनवाई

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ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका की वैधता पर वाराणसी की एक अदालत आज फैसला सुनाएगी।

काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी मस्जिद दशकों पुराने कानूनी विवाद के केंद्र में रही है। यह मुद्दा पिछले साल तब सुर्खियों में आया जब पांच महिला याचिकाकर्ताओं ने मस्जिद और अन्य पुराने मंदिर परिसर के बाहर दीवारों पर दृश्य और अदृश्य देवताओं के सामने दैनिक प्रार्थना करने की अनुमति मांगी। यह क्षेत्र अब साल में एक बार प्रार्थना के लिए हिंदू भक्तों के लिए खुला है।

जहां मुख्य मामले की सुनवाई वाराणसी के जिला जज की अदालत में चल रही है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट इस मुद्दे पर एक अलग याचिका पर सुनवाई कर रही है.

जलघाटी अदालत ने पहले कहा था कि वह मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की याचिका की वैधता पर आज फैसला सुनाएगा। इसके अलावा विश्व वैदिक सनातन संघ की याचिका में यह भी मांग की गई है कि यह क्षेत्र हिंदुओं को सौंप दिया जाए और अंदर मिले शिवलिंग को पूजा करने दिया जाए।

वाराणसी जिला अदालत ने पिछले महीने नवापी मस्जिद में मिले ‘शिवलिंग’ की कार्बन डेटिंग की मांग को खारिज कर दिया था. याचिका चार हिंदू महिलाओं ने दायर की थी। हिंदू पक्षकार द्वारा अदालत में एक याचिका दायर की गई है कि मस्जिद की दीवारों के पास हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ श्रृंगारदेवी मंदिर में दैनिक पूजा की अनुमति दी जाए। 

हिंदू पक्षकारों का दावा है कि अदालत के आदेश पर किए गए सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद के स्नान खंड के पास मिली वस्तु एक प्राचीन शिवलिंग है, जबकि मस्जिद प्रबंधन का कहना है कि यह केवल एक फव्वारा है।