सोशल मीडिया पर सच या झूठ …?

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राज की बात // आप मेरे विचारों से सहमत हो या न हो पर आवश्यक नही है कि सभी के विचार एक जैसे ही हो मत भिन्नता ही मनुष्य को सोचने का अवसर प्रदान करती है यही मानव का स्वभाव है वह दूसरों के विचारों को जानने और समझने के बाद अपने विचारों में परिवर्तन ला सकता है किसी घटना के बारे में उसके विचार स्थाई नही हो सकते है । मत भिन्नता का इतना पुरजोर विरोध कही समाज के लिए घातक तो नही हो रहा है इस पर भी विचार करने की जरूरत है मेरा ऐसा मानना है कि सोशल मीडिया में 90 % लोग इस पर फैलाये जा रहे सच या झूठ को ही अपनी धारणा बना रहे है बिना विचार किये और प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि इस प्लेटफॉर्म पर झूठ ही ज्यादा परोसा जा रहा है जो समाज के लिए हितकर नही है ।

rajkishore dubey
राजकिशोर दुबे

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