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देश की आज़ादी में इन महिलाओं ने दी थी अपने जान की आहूति

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भारत की आजादी में जितना बड़ा योगदान पुरुष क्रांतिकारियों ने दिया, महिला क्रांतिकारियों की भी उतनी ही बड़ी भूमिका रही है। हम सभी क्रांति की उन बड़ी घटनाओं को जानते हैं, जिसमें उस समय के बड़े नेता शामिल थे। लेकिन उस दौरान कई संघर्ष ऐसे भी रहे, जिन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते। ऐसे कई किस्से हैं जिसमें महिला क्रांतिकारियों ने संघर्ष किया और अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उनके इन्ही संघर्ष और बलिदान की बदौलत आज पूरा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है।

कुछ ऐसी ही वीर क्रांतिकारी महिलाऐं थी असम के बेहरामपुर की भोगेश्वरी फुकानानी,कनकलता बरूआ और खाहुली नाथ। जानिए इन तीनो शहीद वीरांगनाओ के पराक्रम की अनसुनी कहानी TRP की इस स्टोरी में।

भोगेश्वरी फुकनानी

भोगेश्वरी 60 वर्ष की थीं जब उन्होंने सितंबर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेजों ने इस संघर्ष को कुचलने की कोशिश की। बेहरामपुर में ब्रिटिश पुलिस वहां के कांग्रेस कार्यालय पर कब्जा करने पहुंची थी। इसका प्रबल विरोध किया गया। इसी दौरान कैप्टन फिनिश के नेतृत्व में सेना की बड़ी टुकड़ी मौके पर पहुंची। अंग्रेजों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया। तब भोगेश्वरी अपनी साथी रत्नमाला के साथ तिरंगा झंडा लेकर आगे बढ़ीं। कैप्टन ने रत्नमाला के हाथ से झंडा छीनकर तोड़ने की कोशिश की। तभी भोगेश्वरी ने अंग्रेज अधिकारी पर हमला बोल दिया और डंडे से वार किया। घबराकर कैप्टन ने भोगेश्वरी को गोली मार दी। वह मौके पर ही शहीद हो गईं।

वीरबाला कनकलता बरुआ

इनका जन्म 22 दिसंबर 1924 को असम के सोनीपुर जिले के गोहपुर गांव में हुआ था। अल्पायु में ही माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी नानी ने उन्हें पाला-पोसा। 1931 में गमेरी गांव में रैयत अधिवेशन हुआ जिसमें तमाम क्रांतिकारियों ने भाग लिया। सात साल की कनकलता भी अपने मामा के साथ अधिवेशन में गईं। इस अधिवेशन में भाग लेने वाले सभी क्रांतिकारियों पर राष्ट्रदोह का मुकदमा चला तो पूरे असम में क्रांति की आग फैल गई। कनकलता क्रांतिकारियों के बीच धीर-धीरे बड़ी होने लगीं। एक गुप्त सभा में 20 सितम्बर 1942 को तेजपुर कचहरी पर तिरंगा फहराने का निर्णय हुआ। उस दिन बाइस साल की कनकलता तिरंगा हाथ में थामे जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। अंग्रेजी सेना की चेतावनी के बाद भी वे रुकी नहीं और छाती पर गोली खाकर शहीद हो गईं। अपनी वीरता व निडरता के कारण वे वीरबाला के नाम से जानी गईं।

खाहुली नाथ

दमदमिया गांव में थाने पर कब्जा करने के लिए पहुंचे आत्मघाती दस्ते का नेतृत्व खाहुली नाथ कर रही थीं। अपने पति पोनराम नाथ के साथ उन्होंने खाहुली ने भारी पुलिस बल की परवाह किए बिना रैली निकाल। जैसे ही तिरंगा झंडा फहराने की कोशिश की गई, पुलिस ने गोली चला दी। जिसमें खाहुली की मौत हो गई। उसी दौरान 12 वर्षीय तिलेश्वरी बरूआ और 18 वर्षीय कुमाली नियोग जैसी महिलाएं भी शहीद हो गईं।

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