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सिवनी में ऐसे भी है यातायात कर्मी

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सिवनी (म.प्र.) के नगरवासी इन्हे नाम से भले न जानते हों लेकिन इनका चेहरा शायद ही किसी के लिए अंजान है। ये हैं “अशोक कुमार मर्सकोले जी” जो एक ट्रैफिक हवलदार है। काफी महीनों से मर्सकोले जी शहर के हिर्दयस्थल, सर्किट हाउस चौराहे पर ड्यूटी कर रहे हैं

जब भी इस चौराहे से गुजरता हूँ तब अशोक जी पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ अपने निर्धारित स्थान पर ट्रैफिक को अपने अंदाज में सँभालते हुए दिखते हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि कहा जाये की लोगो की ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता और पालन इनकी मौजूदगी से संभव हुआ है। शायद मैं इस चौराहे से हर दिन निकलता हूँ लेकिन ऐसा एक भी दिन नहीं हुआ की मैंने इन्हें किसी को बेवजह परेशान करते देखा हो बल्कि यदि कोई जल्दबाजी में या गैरइरादतन तौर पर सिग्नल तोड दे तो उसे समझाइश देकर अगली बार पालन करने का आग्रह ही किया है (एक बार मेरे साथ भी हुआ है)।

सिवनी में आज सुबह से ही बहुत बारिश हो रही थी और मुझे एक आवश्यक कार्य हेतु बरसाती पहनकर निकलना ही पड़ा और जब चौराहे पहुंचा तो चकित रहे गया, मर्सकोले जी प्रतिदिन की तरह आज भी भारी बारिश में बरसाती डाले अपने स्थान पर डटे मिले। दिल जीत लिए भाईसाहब ने तो, फिर क्या अपना काम करके लौटते वक्त अपनी गाड़ी बाजु में लगाकर मिलने पहुँच ही गया (हर दिन जिज्ञासा होने के बाद भी जल्दी के चलते नहीं मिल पाता था) और उन्हें उस रास्ते से गुजरने वाले हर एक व्यक्ति की तरफ से साहिर्दय धन्येवाद प्रेषित किया।


ये वो व्यक्ति हैं जो मेरे और न जाने कितने लोगो के मनोभाव में हर दिन इस बात की एक अनकही प्रेरणा का प्रवाह करते हैं कि जिम्मेदारी और कर्त्तव्य का निसंकोच निर्वहन कैसे किया जाता है। कई मायनों में ये कर्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी की एक सादृश्य प्रतिकृति हैं। मैंने और शायद आपने भी ऐसे लोगो को देखा होगा जो ट्रैफिक हवलदारी को तुच्छ समझकर और अपनी सामाजिक छवि को सुरक्षित रखने के लिए चौराहे के किसी किनारे वाले पान ठेले में खड़े रहकर अपनी ड्यूटी के 8-10 घंटों को जैसे तैसे गुजार देते हैं या दिन भर में 10 -12 लोगो को बेवजह परेशान करके उनसे पैसे की उगाही करते हैं। अशोक जी इन सब परिस्थियों में एक अपवाद हैं। जैसे उन्होंने ने बताया कि उन्हें इसके लिए सम्मान भी मिल चुका है लेकिन सोचा की इनकी कर्तव्यनिष्ठा के चर्चे दूर तक जाने चाहिए। अशोक जी की कार्यशैली और समर्पित सेवाभाव, ट्रैफिक पुलिस के प्रति आम जनमानस के नजरिये को एक नई दिशा दे रहा है।

वो कहावत आपने सुनी ही होगी की “एक मछली पुरे तालाब को गन्दा करती है”, लेकिन मर्सकोले जी द्वारा जिम्मेदारीपूर्ण अपने काम का सतत निर्वहन इस कहावत को उल्टा करता है कि “एक हंस पुरे तालाब को सुशोभित कर सकता है”। कहने का तात्पर्य यह है कि शहर में ट्रैफिक विभाग के प्रति सम्मान की भावना इस एक व्यक्ति के कर्म से जागी है।

प्रेरणाएं आपके चारों ओर हर वक्त हर पल मौजूद हैं, बस नज़र की बारीकी की जरुरत है। जिस दिन बारीकी को परखने में पारंगत हो गए समझिये उस दिन से आपको प्रेरित होने के लिए मोटिवेशनल विडियो या कोटेशन्स की आवश्यकता नहीं होगी।

आपके शेयर करने से मुझे कोई फायदा तो नहीं होगा , हाँ, इतना जरूर है बात निकली है तो दूर तलक जायेगी और अशोक जी को उनका वाजिव सम्मान और पहचान जरूर मिल जायेगी।

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