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Home बड़ी खबर और हम कहते हैं इस दुनिया में इंसानियत अब जिंदा नहीं - योगिता यादव

और हम कहते हैं इस दुनिया में इंसानियत अब जिंदा नहीं – योगिता यादव

योगिता यादव : कलजुग में जी रहे हम सभी प्राणी मानो कलयुगी सोच के हो चुके हैं , जहां हम किसी और व्यक्ति के दर्द का एहसास नहीं कर पाते, ऊंच-नीच ,जात-पात, रंगभेद से आगे नहीं बढ़ पाते। वही आज एक ऐसी घटना मेरी आंखों के सामने हुई जिससे एक बार फिर मुझे यह एहसास हुआ की इंसानियत कभी खत्म नहीं हो सकती इसकी तो हम खुद ही हत्या कर देते हैं। घटना आज सुबह की है जब मैं अपनी मां को लेकर एक डॉक्टर की क्लीनिक में पहुंची, जहां हड्डी रोग विशेषज्ञ के क्लीनिक के दरवाजे पर सोशल डिस्टेंसिंग बनाते हुए लंबी लाइन दिखाई पड़ती है।

इसी बीच मां का नंबर लगा कर मैंने उन्हें हॉल की एक खाली सीट पर बैठा दिया। और हम माँ की जाँच के लिए नंबर आने का इंतजार करने लग गए, इतने में मेरी नजर हमारे बाई ओर रखी एक बेंच पर पड़ी जहां दर्द से लगभग 16 से 17 साल का एक बालक  सुबक -सुबक कर रो रहा था। शायद ऊंचाई से गिर जाने के कारण उसके हाथ की हड्डी टूट गई थी, जरा करीब से जाकर देखा तब समझ आया उसके हाथ में बहुत ज्यादा सूजन थी। पूरे हॉल में हर व्यक्ति की नजर उस दर्द से कराते हुए बालक की ओर पड़ी।

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अकेला बैठा धीमे धीमे रोता बालक बहुत ही गरीब परिस्थिति का नजर आ रहा था। शायद किसी परिजन के साथ डॉक्टर का पता लगा यहां तक पहुंचा था। इससे पहले कि मैं उठ कर खुद रिसेप्शन तक पहुंचकर इस बालक की हालत के बारे में कुछ बात कर पाती । उसको रोता देख अचानक मेरे आंखों से आंसू छलक ने लगे। मानो मेरा कोई अपना दर्द से कराह रहा हो। 

जब आप अंदर से किसी के दर्द को महसूस कर पाते हैं तब अपना पराया नहीं दिखाई देता बस दर्द महसूस होता है उसी दर्द को महसूस करते हुए मेरे आंसू आंसू  भी मेरी आत्मा को चीरते हुए आंखों के रास्ते गिर पड़े ।हम सबको तो यही लगता है न कि किसी भी कतार में एक के बाद एक नंबर के हिसाब से जांच करवाना सही और जरूरी है। वहां बैठे बैठे कुछ मिनट मैं यही सोचती रही कि कैसे इस बालक को पहले डॉक्टर के पास जांच के लिए पहुंचाया जाए।

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एक बार उठकर दरवाजे से बाहर रिसेप्शनिस्ट के पास तक गई भी पर वहां उस समय रिसेप्शनिस्ट बैठा ही नहीं था। पलट कर वापस आई तो वहीं बैठे बगल में कुछ लोगों को बात करते सुना, क्या हुआ है बेटा !!कैसे गिर गए!! रो नहीं साथ में कौन है तुम्हारे?? वही उस बच्चे के दाएं और बैठे भाईजान ने कहा.-. बेटा तुम्हारे साथ जो आए हैं उनका क्या नाम है।

बालक ने रोते-रोते जवाब दिया राधेश्याम। तभी दूसरे सज्जन बोले राधेश्याम कौन है तुम्हारे?? उस बालक ने फिर जवाब दिया पिताजी हैं। जवाब को आधा सुनते ही एक अंकल जी उठे और दरवाजे से बाहर जाकर आवाज देने लग गए राधेश्याम भैया कहां हो?? इस बालक के पिता जी की खोज हॉल में बैठा हर व्यक्ति करने लगा इतने में एक महिला अंदर x-ray टेक्निशियन के पास पहुंच गई। उससे जाकर कहा कि भैया हम लोगों का नंबर तो जब आएगा तब आएगा जरा इस बच्चे को पहले देख लो। लैब टेक्नीशियन अपने काम में व्यस्त था, उसने उस महिला की बात को अनसुना कर दिया।

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इतने में उस बालक के पिता अपने साथ एक साथी लिए हॉल में आए। उनके आते ही बालक के दाएं और बैठे भाईजान और अन्य सज्जनों ने मिलकर कहा- पहले इनका नंबर लगा दो। डॉक्टर से जांच की आवश्यकता हमसे ज्यादा इस बच्चे को है। जब जोर जोर से आवाज होने लग तो रिसेप्शनिस्ट खुद उठकर अंदर आया और उस बालक को धीरे धीरे कंधे पर हाथ रख वाकर उसके पिताजी को उसे अंदर जांच के लिए ले जाने को इशारा किया ।

तब जाकर वहां बैठे सभी जनों ने थोड़ी सी राहत की सांस ली। है तो यह छोटी सी घटना, लेकिन इससे कितना साफ जाहिर होता है न कि आज भी इस कलयुग में अच्छे लोग हैं जो बिना किसी धर्म ,जात-पात, रंगभेद, के किसी और का दर्द अपना दर्द समझ महसूस करते हैं। दर्द से तड़पते हुए बालक को रोते देख मानो हॉल में बैठा हर आदमी दर्द अपने अंदर महसूस कर रहा था। चाहते तो सब चुप रह सकते थे अपनी अपनी बारी आने पर जांच करा कर अपने घर में को निकल सकते थे, पर नहीं वह सब बोले।

बिना किसी जान पहचान के मानव जाति का असली परिचय देते हुए सभी बोले। क्या इससे यह साबित नहीं होता की इंसानियत आज भी जिंदा है और हम बिना बात के ही लोगों को कोसते हैं। आज के इस दौर में जहां इंसान इंसान को छूने से डर रहा है, यहां बैठा हर व्यक्ति एक अपरिचित गरीब बालक के दर्द के लिए भावुक हो रहा था। 

उन्हीं में से एक मैं भी थी, और इसी भावुकता के चलते ऐसा लगा कि हम गलत कहते हैं कि आज का आदमी बुरा है- इंसानियत जिंदा है, हम सब के अंदर। बस उसको दबाकर हम एक दूसरे को कोसते रहते हैं ,अधर्म की तलवार चला कर एक दूसरे की इंसानियत की हत्या करते रहते हैं।

आज की इस घटना ने मुझे यह साबित कर दिखाया। चाहते  तो वहां बैठे लोगों में से कुछ लोग उस बालक के पहले जाने पर आपत्ति भी उठा सकते थे क्योंकि मैंने लोगों को ऐसा करते देखा है, लेकिन आज फिर मेरा मन एक बार प्रफुल्लित हो गया जब मैंने देखा कि” अनेकता में एकता है”।

हॉल में बैठी महिला पुरुष अलग-अलग जाति धर्म के थे अपनी अपनी शारीरिक परेशानियां लेकर जाँच के लिए आए थे। जांच की जल्दी सभी को थी सबके दर्द अपने आप में बड़े थे पर उस बालक का दर्द परिस्थिति अनुसार ज्यादा  बड़ा था जो कि हम सभी को दिखाई पड़ रहा था।

जब हम अपने दर्द से बढ़कर किसी और के दर्द को समझते हैं या उसे कम करने की जरा सी भी कोशिश करते हैं, तो धरती पर हम अपनी इंसानियत का फर्ज कुछ प्रतिशत तो इसी रूप में निभा लेते हैं। उस बालक के टेस्ट होना शुरू हो गए हम सब अपने अपनी बारी आने का इंतजार करने लगा इतने में भाईजान ने एक वाक्य सामने बैठे अंकल जी से कहा- अल्लाह रहम करें।

बच्चे को दर्द से छुटकारा मिले। इस पर हॉल में बैठे सभी महिला एवं पुरुषों ने मुंडी हिला सहमति दी। मैं चुपचाप वहां बैठे अपनी माँ के नंबर की जगह उस बच्चे की रिपोर्ट आने का इंतजार करने लगी। इतने में अंदर से आवाज आई और मां को जांच के लिए बुला लिया गया, मैंने मां की पर्ची और सारा सामान बटोरा ।

जाते-जाते जांच कक्ष की तरफ नजर डालती हुई डॉक्टर साहब के कैबिन में चली गई। अंदर जाते वक्त मन ही मन उस बालक के ठीक होने की कामना करती रही।घटना शायद पढ़ने में बहुत छोटी और बिना सिर पैर की नजर आए, पर अगर इसको आप अपने अंतर्मन से पढेंगे तो आप के आस पास जरूर कुछ ना कुछ ऐसा होता आया होगा जहां आपको मानव जाति ने इंसानियत का परिचय अलग-अलग परिभाषा में दिया होगा।

प्रिय पाठकों मैं चाहती हूं आप इस इंसानियत को पहचाने 
“अपने आसपास घट रही छोटी-छोटी घटनाओं से सकारात्मकता की उर्जा फैलाएं,
धर्म जाति के भेदभाव को मानवता से सरलता से मिटाएं ,ताकि हम नफरत से दुश्मनी नहीं प्रेम से भाईचारा निभाए”

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Shubham Sharmahttps://khabarsatta.com
Editor In Chief : Shubham Sharma

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