भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन स्वयं एक प्रेरक कथा बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जीवन भी संघर्ष, संकल्प, सेवा और नेतृत्व की ऐसी ही कहानी है। प्रस्तुत कविता उसी जीवन-यात्रा को काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्त करने का प्रयास है।
सफ़र: चायवाले से प्रधानमंत्री तक
छोटा-सा गांव वो वडनगर का,
जहां जीते थे लोग रईसी मे।
इसमें दोष कहां था मोदी का,
जो जनम लिया ग़रीबी मे।
मां की ममता का आंचल था,
था पिता-भाई का प्यार मिला।
एक प्यार हीं था जो मिल भी पाया,
बाकी सूख छीना गरीबी ने।
बचपन से ही आदत पड़ गई,
काम मे हाथ बंटाने का।
सेवा घर-घर की मां के साथ,
झाड़ू-पोछा लगाने का।
पिता रहते परेशान बहुत,
जंक्शन पे चाय बनाने मे।
लगे लोगों को चाय पिलाने,
लोगों की कसक मिटाने मे।
अपना जीवन वो भूल चुके,
दुनिया से महरूम थे वो।
क्या होते हैं सपने अपने,
इन सब से भी दूर थे वो।
परिवार ने शादी की जंजीरों से बांधा उनको,
दिल मे थी आवाज़ इक आयी,
करना है कुछ और उनको।
हो विरक्त इस दुनिया से,
निकल गये अंजान सफ़र मे।
हिमालयी उस उपवन मे,
ख़ुद से मिलना था, जो उनको।
घाटी वो बड़ा सुहाना था,
बालक वो व्यस्क थे बन चले।
पहचान कर ख़ुद की शक्ति,
उन्हे वापस दुनिया मे आना था।
मर्यादित कामों मे थे,
कुछ करने की फ़िर से ठानी।
बाटे-साटे बैनर-पोस्टर
शुरू हुई एक नई कहानी।
संघ का तब मिला सहारा,
तनमन से था काम किया।
अटल से ले आडवाणी तक,
कार्यों का पैगाम गया।
आ गए तब राजनीति मे,
आदत थी सेवा करने की।
मां भारती की भी चाहत थी,
उनके कुछ कर गुजरने की।
सफ़र राजनीति का भी,
था इतना आसान नही।
भूकंप पीड़ित गुजरात मे तब,
फूंक दी फिर से जान नई।
प्रगति-पथ पर अग्रसर था तब,
बाकी राज्यो मे निराशा थी।
हताश देश की जनता को बस,
मोदी से इक आशा थी।
सन् चौदह का वो दिन,
जब संसद में प्रवेश किया।
गंगाजल के साथ मे गीता,
देश के नाम भेंट किया।
लगें हैं तब से लगातार,
देश का मान बढ़ाने मे।
US,UK, विश्व लगे हैं,
भारत के गुण गाने मे।
आत्मनिर्भर हो, आयुष्मान हो, चाहे हो तीन तलाक़।
चंद्रयान हो, गगनयान हो,
या तीन सौ सत्तर पर हो बात।
वो सब कर के दिखा दिए,
जिसकी थी देश को आश।
करने से पहले जगा दिए थे,
लोगों का विश्वास।
कसक अभी भी सीने मे था,
दिल से आती आवाज़।
रामलला का कार्य करने को,
थी जनता की फरियाद।
जनता के आदेशों को,
थे सर-आंखों पर ले लिया।
निमित्त कार्य का बनकर वो,
पल-पल समय को जी लिया।
कसक दबा है दिलो के अंदर,
करना बहुत कुछ बाकी है।
तन-मन-जीवन सब समर्पित,
मोदी की यही कहानी है।
सुधांशु शेखर,घेजन,जहानाबाद,बिहार।
संपादकीय टिप्पणी
यह रचना एक काव्यात्मक और वैचारिक प्रस्तुति है। इसमें व्यक्त विचार एवं भाव लेखक के निजी हैं। इसे किसी राजनीतिक प्रचार के बजाय एक साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रकाशित करना अधिक उपयुक्त रहेगा।
लेखक: सुधांशु शेखर, ग्राम+पोस्ट: घेजन, जिला: जहानाबाद, बिहार



