सिवनी। प्रेस क्लब ऑफ सिवनी (प्रेस एसोसिएशन) द्वारा हाल ही में कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्ठ सदस्य श्री अखिलेश दुबे की सदस्यता समाप्त करने के निर्णय को लेकर विवाद गहरा गया है। संस्था के इस कदम को लेकर अब विरोध के स्वर उठने लगे हैं और इसे एकतरफा व न्याय-संगत प्रक्रिया के विरुद्ध बताया जा रहा है।
इस निर्णय पर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे संस्था की गरिमा के प्रतिकूल बताया गया है। विरोध जता रहे सदस्यों का मानना है कि इस कार्रवाई में नियमों और पारदर्शिता की पूरी तरह अनदेखी की गई है।
निष्कासन पर उठाए गए मुख्य बिंदु:
पक्ष रखने का नहीं मिला मौका: शिकायत है कि अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर की गई इस बड़ी कार्रवाई से पहले संबंधित सदस्य को अपना पक्ष रखने या स्पष्टीकरण देने का कोई अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अपारदर्शी कार्यप्रणाली: सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि श्री दुबे द्वारा किस प्रकार की अनुशासनहीनता की गई थी। बिना किसी ठोस कारण या सार्वजनिक विवरण के सदस्यता समाप्त करना संस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
व्यक्तिगत द्वेष की आशंका: उचित प्रक्रिया का पालन न किए जाने के कारण यह आशंका जताई जा रही है कि संभवतः अध्यक्ष और सचिव द्वारा यह निर्णय व्यक्तिगत रंजिश या द्वेष की भावना से प्रेरित होकर लिया गया है।
निष्पक्ष जांच की मांग
प्रेस क्लब के अन्य जागरूक सदस्यों और पत्रकार जगत ने मांग की है कि न्याय की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इस निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए। साथ ही, लगाए गए आरोपों की किसी निष्पक्ष समिति से जांच कराई जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
प्रेस क्लब ऑफ सिवनी अध्यक्ष का पक्ष भी आया सामने
प्रेस क्लब ऑफ सिवनी के अध्यक्ष अयोध्या विश्वकर्मा ने पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पूर्व सदस्य अखिलेश दुबे द्वारा सदस्य रहते हुए प्रेस क्लब के खिलाफ कई गतिविधियों में संलिप्तता पाई गई थी।
अध्यक्ष के अनुसार, प्रेस क्लब चुनाव के दौरान अखिलेश दुबे मतदान परिसर में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने अपने मताधिकार का उपयोग नहीं किया। साथ ही उन पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने के आरोप भी लगाए गए हैं।
अयोध्या विश्वकर्मा ने बताया कि पूरे मामले को कार्यकारिणी सदस्यों के समक्ष रखा गया था। चर्चा के बाद कार्यकारिणी द्वारा अखिलेश दुबे की सदस्यता स्थायी रूप से समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इसके बाद उनकी सदस्यता निरस्त करने की कार्रवाई की गई।

