भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति – हम सिर्फ कमियों की ही बात क्यों करते हैं?

इस ब्लॉग में सद्‌गुरु हमें बता रहे हैं की विश्व की सभी बड़ी आर्थिक संस्थाएं भारत की तरक्की की ओर इशारा कर रही हैं, और हर अच्छे कदम की तारीफ करना जरुरी है। (कमेंट बॉक्स में आप अपनी राय अवश्य दे )

प्रश्न : जब हम भारतीय राजनीति या भारतीय अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो बहुत सारी कमियां या नकारात्मकता सामने आ जाती हैं। ऐसा क्यों हैं, सद्गुरु? सद्गुरु: आज हम ऐसे हो गए हैं कि कहीं भी कुछ नकारात्मक होता है तो हम कहने लगते हैं कि ‘बहुत राजनीति’ हो रही है। यह कितने अफसोस की बात है! राजनीति का मतलब देश में नीति बनाने जैसी एक बेहद महत्वपूर्ण गतिविधि है, जिससे यह तय होता है कि देश कैसे और किस दिशा में आगे बढ़ेगा। अफसोस की बात है कि राजनीतिज्ञों की इस तरह की छवि बन गई है। जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था में नकारात्मकता की बात है तो मेरा मानना है कि ऐसी बातें कुछ खास तरह के लोग फैला रहे हैं, जो नहीं चाहते कि देश तरक्की करे और आगे बढ़े।

आर्थिक संस्थाएं भारत की तरक्की की ओर इशारा कर रही हैं

अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ महत्वपूर्ण व बड़े कदम उठाए जा रहे हैं, जो दीर्घकालीन कदम हैं, जिन्हें उठाने के लिए साहस और एक दृढ़ निश्चय की जरूरत होती है। दुनिया की जितनी भी महत्वपूर्ण आर्थिक संस्थाएं हैं, जैसे – वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, इंटरनैशनल मोनेटरी फंड व वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाएं और कुछ बेहद प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियां, आज उनमें से ज्यादातर ये कह रही हैं कि भारत एक महत्वपूर्ण आर्थिक भविष्य की ओर बढ़ रहा है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह दुष्प्रचार करने में लगे हैं कि यहां सबकुछ गलत हो रहा है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि ‘यह सब फिक्स किया हुआ है’। सुनकर मुझे लगा कि यह तो और भी शानदार बात है कि अगर भारत सरकार वाकई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, इंटरनैशनल मोनेटरी फंड, वर्ल्ड बैंक व मूडी जैसी संस्थाओं के साथ फिक्सिंग कर सकती है, तो इसका मतलब है कि हम वाकई बहुत अच्छा कर रहे हैं! अभी हाल तक देश की कुल तीन प्रतिशत आबादी ही कर(टैक्स) दे रही थी। आज कर से होने वाली आमदनी सौ फीसदी तक बढ़ गई है और यह हालत तब है जब अभी तक देश की सिर्फ चौंसठ प्रतिशत कंपनियों ने अपने कर का रिटर्न भरा है। अगर बाकी बची हुई छत्तीस प्रतिशत कंपनियां भी टैक्स रिटर्न भरेंगी तो राजस्व से होने वाली आय शायद डेढ़ सौ प्रतिशत तक बढ़ जाए।

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जीएसटी लागू करने वाला भारत सिर्फ तीसरा देश है



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कोई भी देश तब तरक्की करता है, जब देश की आर्थिक प्रक्रिया में सभी लोग भागीदारी करते हैं। देश ऐसे तरक्की नहीं कर सकता कि मैं अपनी छोटी सी अर्थव्यवस्था चलाऊं और आप अपनी अलग छोटी सी अर्थव्यवस्था चलाएं। तो अभी तक जो लोग इसी तरह से काम करते रहे हैं, वो लोग इस नई व्यवस्था पर थोड़े हैरान हैं और हालात से संघर्ष कर रहे हैं। हालाँकि कई वैध तरीके से काम करने वाले कारोबारी व संस्थाएं भी इससे थोड़ा परेशान हो रहे हैं। लेकिन यह तकलीफ तो होनी ही थी, जब 42 अलग-अलग तरह के करों को मिलाकर एक कर बनाया गया। यह कोई छोटी कोशिश नहीं थी, पूरी दुनिया में सिर्फ सात ऐसे देश हैं, जिन्होंने यह कदम उठाया है। इन सात में से पांच देशों ने इस तरह से कर ढांचा बनाया है कि उसमें एक संघीय स्तर का कर है, और एक राज्य स्तर का कर है। दुनिया में दो ही देश ऐसे हैं, जिन्होंने सफलतापूर्वक जीएसटी लागू किया है। इस कड़ी में भारत तीसरा देश बन गया है। भारत एक ऐसा देश है जो अपने आप में इतनी विविधताओं से भरा है और यहां अर्थव्यवस्था छोटी-छोटी आर्थिक गतिविधियों से विकसित हुई है। यहां हर कस्बे की अपनी अलग अर्थव्यवस्था है। यहां अर्थव्यवस्था एक संगठित तरीके से विकसित नहीं हुई, यह लोगों का उद्यम(मेहनत) था, जिसने अर्थव्यवस्था का रूप लिया। अगर भारत को एक आर्थिक ताकत बनना है, तो बिलकुल यही समय है कि छोटी-छोटी अर्थव्यवस्थाओं को संगठित करके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का रूप दिया जाए। आज भारतीय आबादी का लगभग साठ प्रतिशत हिस्सा कुपोषित है। जब मैं आर्थिक शक्ति की बात करता हूं तो मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के सारे लोग अच्छी तरह से खाएं। मेरे लिए इसका यही मतलब है।

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हर अच्छे कदम की तारीफ होनी चाहिए

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस राजनैतिक दल से आते हैं या आप किस धर्म से हैं, असली चीज है कि जब कोईं सकारात्मक कदम उठाया जाए तो हम सब को इसके समर्थन में खड़े होना चाहिए। भले ही ऐसा करने में हमें थोड़ी दिक्कत का सामना ही क्यों न करना पड़े। आपमें कम से कम इतनी जागरूकता तो होनी ही चाहिए कि आप देख सकें कि किस चीज में हर इंसान की भलाई छिपी है, फिर भले ही वो काम आपका दुश्मन या विरोधी ही क्यों न कर रहा हो, आपको उसके लिए ताली बजानी चाहिए। तभी आप एक समझदार इंसान कहलाएंगे। चूंकि मैं आपको पसंद नहीं करता, इसलिए आप जो भी करेंगे, मैं उसके बारे में नकारात्मक चीजें ही कहूंगा – जीवन जीने का यह बेवकूफी भरा तरीका है। इस तरह तो दुनिया में कभी भी कोई अच्छी चीज नहीं होगी। तो सारे आर्थिक मापदंड साफतौर पर कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था के कदम मजबूत हो रहे हैं, लेकिन यहां कुछ लोग हैं, जो रो-पीट रहे हैं, क्योंकि उनके पैसे का नुकसान हो गया। हम लोगों को एक बेहद कठोर तरीके से याद दिलाया गया है कि मुद्रा का मतबल ही है कि इसे हमेशा चलन में रहना चाहिए। यह सिर्फ एक साधन है, कोई उत्पाद या वस्तु नहीं है कि आप इसको जमा करके रखें।


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