सिवनी जिले के चर्चित POCSO मामले में विशेष न्यायालय ने आरोपी सुरेंद्र टांडेकर को दोषमुक्त कर दिया है। लखनवाड़ा थाने के अपराध क्रमांक 317/2024 से जुड़े मामले में अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा।
आरोपी की ओर से अधिवक्ता डी.पी. विश्वकर्मा और प्रहलाद सनोडिया ने पैरवी की। अदालत ने साक्ष्यों में सामने आए विरोधाभास और संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
- HEIGHLIGHTS
- लखनवाड़ा थाने के अपराध क्रमांक 317/2024 का मामला
- POCSO एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज था प्रकरण
- विशेष न्यायाधीश किरण कोल की अदालत ने सुनाया फैसला
- आरोपी सुरेंद्र टांडेकर दोषमुक्त
- बचाव पक्ष की ओर से डी.पी. विश्वकर्मा और प्रहलाद सनोडिया ने की पैरवी
- अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सका
- साक्ष्यों में विरोधाभास को भी फैसले में महत्वपूर्ण माना गया
- लखनवाड़ा थाने में दर्ज हुआ था मामला
प्रकरण लखनवाड़ा थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने आरोपी सुरेंद्र टांडेकर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ POCSO एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। मामले का विचारण विशेष न्यायाधीश (POCSO एक्ट) किरण कोल की अदालत में हुआ।
बचाव पक्ष ने साक्ष्यों पर उठाए सवाल
आरोपी की ओर से अधिवक्ता डी.पी. विश्वकर्मा और प्रहलाद सनोडिया ने न्यायालय में पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने अभियोजन द्वारा पेश किए गए न्यायालयीन साक्ष्यों की प्रतिपरीक्षण के दौरान कथित विरोधाभासों को अदालत के सामने रखा। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया है। उन्होंने मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं के साथ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न न्याय दृष्टांतों का भी हवाला दिया।
अदालत ने साक्ष्यों को माना निर्णायक
मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश किरण कोल ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा। अदालत ने साक्ष्यों में मौजूद विरोधाभास और संदेह का लाभ आरोपी को देते हुए सुरेंद्र टांडेकर को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
दोषमुक्ति का मतलब क्या है?
अदालत से दोषमुक्त किए जाने का अर्थ है कि इस मामले में अभियोजन आरोपी के खिलाफ अपराध कानूनी रूप से सिद्ध नहीं कर सका। इसे आरोपों की न्यायिक पुष्टि के रूप में नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत द्वारा दिया गया निर्णय समझा जाना चाहिए।
अधिवक्ता ने बताया न्याय की जीत
फैसले के बाद अधिवक्ता डी.पी. विश्वकर्मा ने इसे सत्य और न्याय की जीत बताया। उन्होंने कहा कि अदालत ने बचाव पक्ष के तर्कों को गंभीरता से सुना और निष्पक्ष निर्णय दिया। दोषमुक्ति के फैसले के बाद दोनों अधिवक्ताओं की पैरवी की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर हो रही है। POCSO अधिनियम बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। ऐसे मामलों में आरोपों की प्रकृति गंभीर होती है, लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के अनुसार साबित करना होता है।
इस मामले में अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ मिला और वह दोषमुक्त हुआ। अदालत के फैसले से आरोपी पक्ष को बड़ी राहत मिली है। वहीं यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में भी अदालत फैसला उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहियों और कानूनी कसौटियों के आधार पर करती है।
सिवनी के लखनवाड़ा थाने से जुड़े POCSO मामले में विशेष न्यायालय ने आरोपी सुरेंद्र टांडेकर को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने अभियोजन द्वारा आरोपों को सिद्ध नहीं कर पाने और साक्ष्यों में विरोधाभास को ध्यान में रखते हुए आरोपी को संदेह का लाभ दिया।


