सिवनी (बरघाट, धारनाकला): मध्य प्रदेश में स्कूल चले हम अभियान के तहत 1 अप्रैल 2026 से प्रवेश उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों में शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना है।
01 से 04 अप्रैल तक चले इस अभियान के दौरान विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें, स्कूल किट, साइकिल वितरण और “भविष्य से भेंट” जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।
लेकिन इसी उत्सव के बीच शिक्षकों का दर्द भी खुलकर सामने आ गया, जिसने सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत उजागर कर दी।
🎓 1000 छात्र-छात्राएं, सिर्फ 8 कमरे — कैसे बनेगा भविष्य?
धारनाकला स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में करीब 1000 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं, लेकिन उनके लिए केवल 8 कमरे (हाल) उपलब्ध हैं।
जहां एक कक्षा में अधिकतम 40–50 विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था होनी चाहिए, वहीं यहां 100 से अधिक बच्चों को एक ही हाल में बैठाया जा रहा है।
स्थिति इतनी खराब है कि:
- एक ही बेंच पर 3–4 छात्र बैठने को मजबूर हैं
- कक्षाओं में घुटन और ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है
- पढ़ाई का माहौल पूरी तरह प्रभावित हो रहा है
विद्यालय प्रबंधन द्वारा कई बार अतिरिक्त कमरों की मांग की गई, लेकिन वर्षों से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
पेयजल संकट: बच्चों को नहीं मिल रहा साफ पानी
विद्यालय में सिर्फ बैठने की ही नहीं, बल्कि पेयजल की भी गंभीर समस्या बनी हुई है।
करीब 1000 छात्रों और 35 शिक्षकों वाले इस विद्यालय में लंबे समय से पानी की उचित व्यवस्था नहीं है।
छात्र या तो घर से पानी लाते हैं या फिर अस्थायी और असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।
प्रवेश उत्सव में छलका दर्द, शिक्षकों की आंखें हुई नम
प्रवेश उत्सव के दौरान जहां एक ओर कार्यक्रमों में उत्साह दिखा, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों ने मंच से अपनी समस्याएं दर्द भरे शब्दों में साझा कीं।
कई शिक्षक भावुक हो गए और उन्होंने बताया कि:
- संसाधनों की कमी के बीच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना मुश्किल हो रहा है
- बच्चों का भविष्य दांव पर लगा है
- प्रशासन का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा
सांसद-विधायक निधि पर सवाल — शिक्षा में क्यों नहीं हो रहा उपयोग?
कार्यक्रम के दौरान यह सवाल भी जोरदार तरीके से उठा कि आखिर सांसद निधि और विधायक निधि का उपयोग शिक्षा क्षेत्र में क्यों नहीं किया जा रहा?
जबकि:
- पंचायतों में लाखों रुपए के निर्माण कार्य होते दिखते हैं
- कई बार इन कार्यों में गुणवत्ता को लेकर सवाल भी उठते हैं
ऐसे में सवाल यह है कि क्या इन निधियों का उपयोग स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं सुधारने में नहीं किया जा सकता?
क्या सिर्फ नामांकन से सुधरेगी शिक्षा व्यवस्था?
धारनाकला का यह मामला सिर्फ एक स्कूल की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की बड़ी सच्चाई है। यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो:
- बच्चों की शिक्षा गुणवत्ता प्रभावित होगी
- स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ेंगे
- “शिक्षा का अधिकार” सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा
👉 अब सबसे बड़ा सवाल यही है — “क्या हम सिर्फ बच्चों को स्कूल ला रहे हैं, या उन्हें बेहतर भविष्य भी दे रहे हैं?”

