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पाक के रास्ते पर चलता चीन: बड़ी शक्तियां दुस्साहस नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ आचरण करती हैं

बीती 12 अक्टूबर को 14वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने एक बार फिर मेजर जनरल लियु लिन से मुलाकात की। लियु लिन दक्षिण शिनझियांग मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के कमांडर हैं। इस मुलाकात का मकसद लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर शांति एवं स्थायित्व कायम करने के लिए किसी सहमति पर पहुंचना था। इस बैठक में दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रालयों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। बैठक के बाद जारी बयान में दोनों पक्षों ने तनाव घटाने के लिए जल्द कोई परस्पर स्वीकार्य समाधान तलाशने पर सहमति जताई। यह भी कहा गया कि वार्ता सार्थक एवं सकारात्मक रही।

केंद्रशासित प्रदेश के रूप में लद्दाख को मान्यता नहीं

जहां संयुक्त बयान में सही दिशा में आगे बढ़ने के संकेत दिए गए, वहीं चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने उकसाने वाली टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि चीन केंद्रशासित प्रदेश के रूप में लद्दाख को मान्यता नहीं देता। उनके अनुसार इसे अवैध रूप से यह दर्जा दिया गया है। उन्होंने अरुणाचल को लेकर भी बदजुबानी की। लद्दाख में विकसित हो रहे बुनियादी ढांचे पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने वहां सैन्य जमावड़े को समस्या की असल जड़ बताया। इससे स्पष्ट हुआ कि चीन नरम-गरम नीति पर चल रहा है।

चीन का वार्ता में नरम रवैया और बाहर अलग रवैया

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जहां वार्ता में उसके प्रतिनिधि नरम रवैया अपनाते दिखते हैं, वहीं उसके प्रवक्ता तीखी टिप्पणियों से भारत के खिलाफ अपनी असली मंशा जाहिर करते हैं। भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। ऐसे में सरकार द्वारा कुछ बिंदुओं पर स्पष्टता का रुख राष्ट्रहित में जरूरी होगा, खासतौर से इसलिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने सभी मोर्चों पर भारत के हितों को मजबूती से आगे बढ़ाया है और देश की सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा के प्रश्न पर उनका रवैया मुखर होता है।

भारत की मांग: चीन एलएसी पर पहले की स्थिति कायम करे

अभी तक भारत की मुख्य रूप से यही मांग रही है कि चीन ने एलएसी से सटे भारतीय इलाकों में जो अतिक्रमण किया है, वहां वह पहले की स्थिति कायम करे। दूसरी बात इस क्षेत्र में भारतीय सेना द्वारा परंपरागत रूप से निर्बाध गश्त लगाने से जुड़ी हुई है।

संयुक्त बयान में यथास्थिति बहाल करने की भारतीय अपेक्षा का उल्लेख नहीं

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संयुक्त बयान में गतिरोध दूर करने के लिए परस्पर स्वीकार्य समाधान में यथास्थिति बहाल करने की भारतीय अपेक्षा का उल्लेख नहीं है। जहां इस बात का संयुक्त बयान में जिक्र होना जरूरी था, वहीं यह भी साफ होना चाहिए था कि भारत को एलएसी पर मई से पहले की स्थिति से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं। भारत को यह बात भी जोर देकर कहनी चाहिए कि एलएसी के अपने इलाके में उसे अपनी सेना को कहीं भी तैनात करने का अधिकार है और उसमें चीन की इस आपत्ति को देखते हुए पीछे हटने का प्रश्न ही नहीं कि भारतीय सेना चीन की सैन्य गतिविधियों पर सीधी नजर रखने में सक्षम है। लद्दाख में हमारे सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया जा सकता।

चीनी सेना ने पीछे हटने को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए

सैन्य कमांडरों के बीच चर्चा भले ही सार्थक एवं सकारात्मक रही हो, परंतु चीनी सेना ने उस स्थिति से पीछे हटने को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए, जिसके कारण यह समस्या पैदा हुई है। उसके पीछे हटने पर ही दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच सितंबर में मास्को में हुई बातचीत की दिशा में कुछ प्रगति हो सकेगी।

भारत ने चीन के दावे को खारिज किया

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यह ठीक नहीं कि चीनी विदेश मंत्रालय तल्ख बयानबाजी करता रहे। उसने न केवल लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र वाले फैसले पर सवाल उठाए, बल्कि यह तक कहा कि एलएसी वास्तव में चीन के 1959 वाले दावे के अनुरूप ही है। भारत ने उसके इस दावे को खारिज किया और साथ ही उसे यह भी स्मरण कराया कि भारत ने कभी इस दावे को स्वीकार नहीं किया। यह दावा 1993 और 1996 में एलएसी पर शांति-स्थायित्व बनाए रखने वाले समझौतों के भी विरुद्ध है। यह बिल्कुल बेतुकी बात है कि भारत चीन द्वारा 1959 के किसी दावे को लेकर उससे सीमा समझौते पर वार्ता के लिए सहमत हो सकता है।

राजनाथ ने कहा- पाक और चीन मिशन के तहत सीमा पर समस्याएं उत्पन्न करने में लगे

चीनी सेना के रवैये को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एकदम दुरुस्त कहा कि पाकिस्तान और चीन, दोनों सीमा पर समस्याएं उत्पन्न करने में लगे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी मिशन के तहत मिलकर ऐसा कर रहे हैं। गैर जिम्मेदारी का परिचय दे रहे पाकिस्तान और चीन को यह समझना होगा कि परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच क्षेत्रीय एवं सीमा संबंधी मसलों को शांतिपूर्ण वार्ताओं के जरिये ही सुलझाने का प्रयास किया जाता है। समझदार सरकारें जानती हैं कि परमाणु शक्तिसंपन्न देशों के बीच उकसाने वाली कार्रवाई अत्यंत ही खतरनाक साबित हो सकती है। अभी तक पाकिस्तान आतंकवाद के जरिये भारत को उकसाता रहा। अब यही काम चीन सीमा पर अपनी बदनीयती दिखाकर कर रहा है।

बड़ी शक्तियां दुस्साहस नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ आचरण करती हैं

चीन को इससे अवगत होना चाहिए कि बड़ी शक्तियां दुस्साहस नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ आचरण करती हैं। वास्तव में चीन पाकिस्तान की तरह व्यवहार कर रहा है। यह किसी से छिपा नहीं कि परमाणु हथियार हासिल करने के बाद भी पाकिस्तान एक जिम्मेदार देश नहीं बन पाया है। वह लगातार भारत को आतंक के जरिये परेशान कर रहा है और परमाणु शक्ति वाले देश से जुड़े सिद्धांत की अनदेखी कर रहा है। यह सिद्धांत यही है कि कोई भी परमाणु शक्ति संपन्न देश अपने क्षेत्र में किसी दूसरे परमाणु शक्ति संपन्न देश को उकसाने का काम नहीं करेगा। इसी कारण शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ इस सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध रहे। नि:संदेह उनके बीच तमाम संघर्ष छिड़े, लेकिन वे वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे देशों की जमीन पर हुए।

चीन की बढ़ती आक्रामक नीतियों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित है

चीन को समझना ही होगा कि वह भारत के साथ वैसा सुलूक नहीं कर सकता, जैसा वह उन देशों का साथ करता है, जिनके पास परमाणु हथियार नहीं हैं। परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच समीकरण एकदम अलग होते हैं। चीन भारत पर ऑस्ट्रेलिया की भांति आर्थिक शिकंजा भी नहीं कस सकता, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत का कद बड़ा है। चीन की बढ़ती आक्रामक नीतियों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय खासा चिंतित है और इससे उसके खिलाफ माहौल भी बनने लगा है। आर्थिक एवं राजनीतिक दबाव या सैन्य हेकड़ी दिखाने वाली अपनी मौजूदा नीतियों से चीन कभी अपने महत्वाकांक्षी स्वप्न को साकार नहीं कर सकेगा। भारत को दबाव में लाने में उसे नाकामी ही हाथ लगेगी। ऐसे में उसे अपरिपक्व व्यवहार से बाज आना चाहिए।

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